462 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
कोशिशें करनी पड़ी। बस इस युद्ध से पूर्व जर्मन जनता एक हुई, उसके अंतरंग और बाह्यरंग में एकरूपता पैदा हुई, उसके रोजमरा के बर्ताव में भी एकता झलकने लगी। उलझनभरी इस राह से हिंदुस्तान अभी उबर नहीं पाया है। ऐसा नहीं कि उसे कोई मौका नहीं मिला। वास्तविकता यह है कि हिंदुस्तान को कई बार ऐसे मौके मिले हैं। 1927 में लाई बर्कनहेड द्वारा राजनीतिक संविधान निर्माण करने की चुनौती दी थी वह पहला मौका था। हिंदी लोगों द्वारा उसे स्वीकारा गया और संविधान निर्माण के लिए एक समिति बनाई गई। इस मंडल के द्वारा ‘नेहरू संविधान’ शीर्षक से एक संविधान बनाया और लोगों के समाने रखा। लेकिन लोगों द्वारा उसे स्वीकारना तो दूर बिना किसी षोक प्रदर्षन के उसे ठिकाने लगा दिया। 1930 में हिंदी लोग गोलमेज परिशद के लिए इकट्ठा हुए थे वह दूसरा मौका था। उस वक्त भी हिंदी लोग अपना दांव लगा नहीं पाए और न ही संविधान का निर्माण कर पाए। अभी कुछ समय पूर्व सप्रू कमेटी द्वारा तीसरी कोशिश की गई लेकिन व्यर्थ।
एक बार और कोशिश करने को लेकर अब न आशावद बचा है न उत्सुकता। जो भी कोशिश की जाएगी उसे विफल ही होना है। इसलिए, लोग सोच रहे हैं कि आखिर कोशिश भी क्यों करें? इस अवसर पर मैं यह बताना चाहता हूं कि किसी भी हिंदुस्तानी को हिचकिचाना नहीं चाहिए। मृत ढोर से उठने वाली दुर्गध की तरह इन मुश्किलों से सडांध आने तक उन्हें कठोर भी नहीं बनना चाहिए। इस देश की राजनीति में कुत्तों की तरह ही लोगों के बीच झगड़े मचे हैं, देखते रहने के अलावा हम कर भी क्या सकते हैं इस प्रकार का भाव भी व्यक्त नहीं करना चाहिए। पहले असफलता का मुंह देखना पड़ा था इसलिए हतोत्साहित भी नहीं होना चाहिए। क्योंकि, मुझे ऐसा लगता है कि आज तक जातीयता के मसले हल करने की सभी कोशिशें बेकार गईं। इसके लिए हिंदुतानियों का कोई अनुवांशिक दोष कारण नहीं है। अब तक इस असफलता का कारण रहा है वह यह कि, इस समस्या को हल करने के लिए जो रास्ते अपनाए गए वे गलत थे। निर्विकार मन से अगर इस योजना को अपनाया जाएगा तो वह स्वीकार योग्य लगेगा। इस मसले को हल करने वाला नया नजरिया इस योजना में है। हिंदी लोग इस पर सोचें जरूर।
आखिर, मेरे समीक्षक इस योजना पर कुछ सूचनाएं रख सकते हैं लेकिन समूची योजना कोखारिज करना उनके लिए भी मुश्किल होगा। इसके बावजूद अगर पूरी योजनाखारिज की जाए तो जिन तत्वों पर वह आधारित है उनके में उन्हें तकरार पेश करनी होगी। ख्1,
डॉ. बाबासाहकब अम्बेडकर के इस भाषण पद ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ अखबार ने संपादकीय छापा। साथ ही, श्री ठक्करबाप्पा ने इसी अखबार कोखत लिख कर प्रतिक्रिया व्यक्त की। संपादकीय और ठक्करबाप्पा केखत का जबाव डॉ. अम्बेडकर ने ‘टाइमस
- जनताः 19.5.1945, 28.5.1945, 2.6.1945, 9.6.1945, 16.6.1945, 26.6.1945