219 6.5.1945 हमें जातीय बहुमत नहीं, राजनीतिक बहुमत चाहिए - मुंबई - Page 484

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ऑफ इंडिया’ के जरिए दिया। इस बारे में 26 मई, 1945 के ‘जनता’ अखबार मेंखबर छपी थी जो यहां दे रहे है- संपादक

मुंबई के ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ इस अंग्रेजी अखबार के संपादकीय में डॉ. अम्बेडकर की योजना की जो समीक्षा की गई है उसका और ‘ऑल इंडिया हरिजन सेवक संघ’ के महासचिव श्री ठक्कर बाप्पा द्वारा 17 मई, 1945 के ‘टाइम्स’ के अंक में की समीक्षा का जवाब डॉ. अम्बेडकर ने टाइम्स’ के जरिए दिया। डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर के जवाब 17-5-1945 और 18-5-1945 को प्रकाशित हुए। जनता की पठन सुविधा के लिए उन्हें यहां प्रस्तुत किया जा रहा है।

संपादक, ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’

जातीयता संबंधी मुश्किलों को हल करने संबंधी मेरे द्वारा सुझाई गई योजना पर ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ के 17 मई, 1945 के संपादकीय में समीक्षा छपी है। समीक्षा में संपादक महोदय लिखते हैं इस योजना के बारे में हिंदू और मुसलमानों की यही राय होगी कि यह योजना अस्पृश्यों की हितसाधन के लिए उन्हें भरपूर अधिकार देने वाली योजना है।

डॉ. अम्बेडकर की इस योजना का बारीकी से अध्ययन करने पर पता चलता है योजनानुसार केन्द्रीय और प्रांतीय विधिमंडल में अस्पृष्यों को दी जाने वाली सीटों के कारण दो श्रेष् समुदायों पर वे अपनी वर्चस्विता का इस्तेमाल कर सकेंगे। योजना में इसी तरह का प्रबंध रखा गया है। उस प्रकार गलत तरीके से अनादि काल से पददलित लोगों को नए समुदाय का दर्जा दिलाने की छलपूर्ण तरीके से कोशिश की गई है।

...हमारी राय में डॉ. अम्बेडकर की योजना विधायक होने के बावजूद अस्पृश्य नेता हिंदू-मुसलमानों द्वारा की जाने वाली जिस अत्युक्ति की बुराई करते हैं, वहीं उनकी इस योजना में आत्यंतिक चरम रूप में दिखाई देती है।

मुझेखेद के साथ कहना पड़ रहा है कि यहां मेरी योजना का गलत, विपरीत अर्थ प्रतिपादित किया गया है। सापेक्ष बहुमत के सिद्धांत का भतितार्थ ही टाइम्स वालों की समझ में न आने के कारण ऐसा हुआ है।

मेरी बनाई योजना के बारे में फैलाई गई गलतफहमियों को दूर करने के लिए आगे जो लिख कर भेज रहा हूं उसे आशा है, अपने अखबार में जगह देंगे।

संपादक महोदय एक बात भूल गए हैं- वह यह कि, एक बार सापेक्ष बहुमत को मान लिया जाए- लगता है कि संपादक उसे मानते हैं, तो संपूर्ण बहुमत और सापेक्ष बहुमत के फर्क जितनी सीटें ही बाकी रह जाती हैं। पत्थर मान कर हम इन सीटों को