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अधिक अधिकार दिए जाएं और उसी आधार से मुसलमानों की तुलना में अस्पृश्यों को विशेष रियायतें दी जाएं।
डॉ. साहब का यह तत्व अगर आदिवासी जनजातियों (abarigins) पर लागू किए जाएं तो अस्पृश्यों की तुलना में कई गुना अधिक रियायतें उन्हें दी जाएंगी और इस कारण संपूर्ण बहुमत होने की संभावना है। लेकिन पहाड़ी इलाकों में जीवन बिताने वालें इन एक करोड सडसठ लाख गरीबों को डॉ. अम्बेडकर साफ भूल गए हैं। इससे एक बात बिल्कुल साफ तौर पर सामने आती है। कि अस्पष्ष्यों के लिए पक्षपात के चरम बिंदु तक पहूंचने वाले डॉ. अम्बेडकर आदिवासी लोगों के न्यायपूर्ण अधिकारों के लिए मना कर रहे हैं जो कि तिरस्करणीय है।
ए.बी. ठक्कर
श्री ए.बी. ठक्कर बाप्पा की समीक्षा को डॉ. बाबासाहेब द्वारा दिया गया जवाब-
संपादक, टाइम्स ऑफ इंडिया, को
महोदय
श्री ठक्कर द्वारा की गई मेरी योजना की समीक्षा के इस जवाब को उम्मीद है कि अपने अखबार में जगह देंगे।
जातीय मसौदा प्रस्तुत करते हुए ‘आदिवासी समुदायों (अबओंरिजिन्स) के हकों को मैंने नजरंदाज किया है’ का आरोप इन समुदायों की ओर से मुझ पर डंडा फटकारते हुए किया है। इस डंडे की शोभा बढ़ाने के लिए मेरा वर्णन करते हुए वह मुझे कहते हैं कि मैं दलितों, गरीब-गुरबों का मसीहा हूं। मेरी इच्छा है कि मैं श्री ठक्कर को बता दूं कि, ‘मैंने ऐसा कभी नहीं कहा है कि मैं दलित मानव जाति का सार्वभौम नेता हूं। मेरी शक्ति के हिसाब से अस्पृश्य समाज का काम मेरे लिए काफी है। आपके और गांधी के चंगुल से अगर मैं अस्पृश्यों को मुक्ति दिला सका तो मुझे चरम आनंद होगा।
मैं किसी काम को कमतर आंकने की इच्छा नहीं रखता। जीवन की सीमा को ध्यान में लें तो एक व्यक्ति एक ही काम कर सकता है। इसी बात को ध्यान में रखते हुए श्री ठक्कर के कहे अनुसार, जिसे आदिवासी लोग भी दुत्कारते हैं उस अस्पृश्य समाज के कार्य के लिए मैंने अपने आपको समर्पित किया है। अखबार में प्रकाषित में भाषण के हिस्से को पढ़ कर मेरी आलोचना करने वाले श्री ठक्कर पर मुझे दया आती है। वे अगर मेरा पूरा भाषण पढ़ने का कष्ट करते तो उन्हें पता चलता कि मेरी योजना में जंगली लोगों को शामिल भी किया गया है और उनके हकों की बेहतर ढंग से रक्षा भी की गई है। प्रस्तुत योजना की बारी रिकियों के बारे में बताने के लिए यहां कम जगह है।