219 6.5.1945 हमें जातीय बहुमत नहीं, राजनीतिक बहुमत चाहिए - मुंबई - Page 487

466 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

मुझ पर पक्षपाती होने और क्षुद्र मनोवृत्ती पालने का आरोप मढ़ने से पहले वे आदिवासी जनजातियों के नजरिए से मेरी योजना पर सोचें। विधिमंडल की सीटों का बंटवारा करते समय मैंने आदिवासी जनजातियों को शामिल नहीं किया। उनसे मेरा बैर है इसलिए नहीं बल्कि उनके पास राजनीतिक मनः सामर्थ्य नहीं है। इसका मुझे यकीन है इसलिए। मैं श्री ठक्कर से पूछता हूं कि आदिवासी जनजाति को वे किस हाल में हैं इसका अहसास होने के लिए राजनितिक सत्ता के बल पर हिंदुओं की बराबरी का दर्जा दिलाने के लिए और उनके शैक्षिक स्तर में सुधार लाने के लिए आपने अपनी व्यावसायिक समाज सेवा के कार्यकाल में क्या आपने कुछ किया क्या? अपनी बीस साल की समाजसेवा के दौरान इन आदिवासी जनजातियों में से श्री ठक्कर बाप्पा किसी एक को भी ग्रेज्युएट नहीं बना सके। यह बात उनकी समाज सेवा पर कालिख पोतने वाली है।

दूसरी बात यह है कि क्या वे बताएंगे कि इस जनजाति को विधिमंडल में प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए ऐसा अचानक श्री ठक्कर को क्यों लगने लगा?

इस जनजाति की जनसंख्या का अनुपात देखते हुए 1935 के कानून में उन्हें बिल्कुल नगण्य प्रतिनिधित्व मिला। श्री ठक्कर ने इस कानून के खिलाफ क्या कभी आवाज उठाई? क्या कभी उन्होंने सप्रू कमेटी के खिलाफ कुछ कहा है? मेरे बारे में श्री ठक्कर बाप्पा का जो दुराग्रह और द्वेष हैवह किसी और के बारे में नहीं है, यही इसकी वजह है।

तीसरी बात यह है कि आदिवासी जनजातियों को विधिमंडल में उनकी जनसंख्या के अनुपात में या अधिक सीटें मिलनी चाहिए ऐसा अगर श्री ठक्कर को लगता है तो इसके लिए मुसलमानों की सीटों से ही दी जा सकती हैं। सो आदिवासियों की लड़ाई लड़ने के लिए मुसलमानों से टकराने के लिए श्री ठक्कर तैयार है? अस्पृश्यों की सीटें काट कर वह अस्पृश्यों के प्रति अपना प्रेम व्यक्त नहीं कर सकते। श्री ठक्कर उन लोगों के खिलाफ हथियार उठा कर अपनी मर्दानगी दिखा रहे हैं जिन अस्पृश्य लोगों को अब तक जनसंख्या के अनुपात में प्रतिनिधित्व नहीं मिला है। मुसलमानों को मिल रहे अतिरिक्त अधिकारों से अगर वह आदिवासियों को कुछ लेकर दे सके तभी उन पर उनका प्रेम और नायकत्व साबित होगा।

-बी. आर. अम्बेडकर