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* व्यक्ति की आजादी के मूल्यमापन का मुलभूत माप है राजनीति
पुणे के ‘अहिल्याश्रम’ परिसर में बुधवार, 3 अक्तूबर, 1945 को ‘अम्बेडकर स्कूल ऑफ पॉलिटिक्स’ संस्था का शुभारंभ समारोह डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर के हाथ बड़ी धूमधाम से मना। समारोह में राजनीति का अध्ययन करने वालों का मार्गदर्शन करने तथा प्रचलित हिंदी राजनीति का शास्त्राधारित विशुद्ध ज्ञान देने के लिए डॉ. बाबासाहेब के अत्यंत विद्वतापूर्ण भाषण दिया।खास कर डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर ने अपने भाषण में गांधी ने राजनीति में पदार्पण के बाद काँग्रेस को कैसे सिद्धांतविहीन और बुद्धिहीन भेड़ों के बाड़े में तब्दील कर दिया है और उस कारण देश का कितना भयंकर नुकसान हुआ है इसका विवरण दिया। डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर ने कहा।
इस संस्था का निर्माण राजनीति का अध्ययन करने के उद्देश्य से हुआ है और मुझे यह उद्देश्य मान्य है। जानता हूं कि आप मुझ पर पूरा भरोसा करते हैं और इसीलिए मैं अपने विचारखुले दिल से आपके सामने रखने वाला हूं।
किसी भी पीढ़ी के लोगों के सामने तत्कालीन समयानुसार जो भी महत्वपूर्ण प्रश्न होंगे उन्हें आजादी के साथ सोच कर हल करने की स्वतंत्रता उन्हें मिलनी चाहिए। अगर कोई समाज गुलामी की बेडि़यों में जकड़ा गया हो उसे अपनी आजादी हासिल करने के लिए दिन-रात संघर्ष करते रहना चाहिए।
विशिष्ट विचारों को पवित्र मानते हुए पीढि़यों तक निरंतर उनका स्वीकार और पालन होना ही चाहिए इस प्रकार की सोच जिस समाज के रोम-रोम में घुल जाए वह समाज आखिर अधोगति को प्राप्ति होगा इसमें कोई शक नहीं। महंमद पैगंबर, ईसा ससीह महान दार्शनिक रहे होंगे, पैगंबर का ‘कुराण’ ईसा मसीह की ‘बाइबिल’ और श्रीकृष्ण की ‘गीता’ इन धर्मग्रंथों के बारे में सोचिए। कुराण में महंमद पैगंबर ने जो कहा, बाइबिल में ईसामसीह ने जो कहा और गीता में श्रीकृष्ण ने जो कहा वह सबका सब ‘यावच् चंद्रदिवाकदौं’ सत्य और प्रमाण माना जाए इस प्रकार का बंधन डाले जाने के कारण इंसान की बुद्धि को हमेशा के लिए दर किनार कर दिया गया है। इसलिए सत्य क्या है असत्य क्या है, अपने उद्धार का मार्ग क्या है यह समझने की कोई कोशिश तक नहीं करता। यह बात बहुजन समाज और देश के लिहाज से पूरी तरह विघातक है। यह मैं
* जनताः 13 अक्तूबर, 1945