470 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
अपना सौभाग्य मानता हूं कि आप मुझे भगवान नहीं समझते। आज तक मैं आपसे जो भी कुछ कहता रहा वह इसी भूमिका से बताया कि वह आपकी बुद्धि आत्मसात कर लेगी। बुद्धि की कड़े परीक्षण में तप कर कुंदन बन चुकी बातों का ही मैं आज तक प्रतिपादन करता आया हूं। कानून या किन्हींखास तत्वों पर भले मेरा धर्म आधारित न हो, लेकिन उसमें ‘वास्तविकता’ आपकों जरूर दिखाई देगी।
सबको एक बात ध्यान में रखनी जरूरी है कि हर पीढ़ी के सामने जो विभिन्न मसले उपस्थित होते हैं उन्हें हल करने के लिए पुरानी पीढि़यों के लोगों की सोच का ही सहारा लेना हर बार काफी नहीं होता। मान लीजिए आज आपके सामने कोई राजनीतिक समस्या पैदा हुई। उसे हल करते समय आपका यह सोचना काफी नहीं होगा कि आज अगर लो. तिलक जीवित होते तो वे इस मसले को कैसे हल करते उसी तरह हम भी उसका हल ढूंढेंगे। मेरी स्पष् धारण है कि इस प्रकार हम उस समस्या का हल सफलतापूर्वक ढूंढ नहीं सकते।
अगर कोई कहे कि इंसान को जन्म से ही राजनीति का ज्ञान होता है तो उनका कहना सरासर गलत होगा। बल्कि मैं तो यह कहूंगा कि इंसान में राजनीतिक नजरिया पैदा करना कीमिया करने से कम नहीं। इंग्लैंड के इतिहास के पन्ने मेरे इस कथन की पुषि् करेंगे। व्यक्ति मात्र की स्वतंत्रता को मापने का मूलभूत माप है राजनीति।
गांधी के राजनीति में घुसने से पूर्व हमारे देश में राजनीति के पाठ पढ़ाने वाले दो विचार प्रवाह थे। पहला विचार था रानडे- गोखले का उदार मतवादी प्रवाह ( Liberal School of Thoughts ) और दूसरा बंगाल के क्रांतिकारियों का विचार प्रवाह ( School of Revolutionaries ) उदारमतवादियों के स्कूल में बुद्धिहीनों को कभी दाखिला नहीं मिलता था और क्रांतिवादियों के स्कूल में सिद्धांत विहीन लोगों का प्रवेष जर्जित था। रानडे-गोखले प्रणित विचारधारा में केवल बुद्धिवादियों को ही शामिल किया जाता था। ज्ञान प्राप्त करना और सोचने-समझने की मानसिकता पर यहां पूरा बल था। राजनीति में कुषलता प्राप्त लोगों को ही उदारमतवादियों के स्कूल में प्रवेष मिल पाता था। क्रांतिवा दयों के स्कूल के भी कड़े नियम थे। प्राणों की तिलांजली देने की प्रतिज्ञा करनेवालों को ही इस विचारप्रवाह में प्रवेश मिल सकता था। लेकिन गांधी की विचारप्रणाली या उनकी विचारधारा के स्कूल के दरवाजे केवल बिन बुद्धिवालों या सिद्धांतविहीन लोगों के लिए हीखुले रखे गए थे। काँग्रेस की राजनीति में बुद्धिवादियों की कोई जगह नहीं। इसीलिए कहना पड़ेगा कि बुद्धिवाद और सोच-समझ से काँग्रेस वाले शुरू से अलग रहे, यह मेरी स्पष् राय है।
राजनीति किस चिडि़या का नाम है यह कांग्रेस श्रेष्ी जानते ही नहीं। इस कारण