222 4.10.1945 अपनी उन्नति की खातिर हमें देश को मिलने वाली सत्ता में शामिल होना चाहिए - पुणे - Page 499

478 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

बजे एक बार फिर व²कग कमेटी की बैठक शुरू हुई। इस बैठक में भी डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर उपस्थित थे। इस बैठक में सेंट्रल पार्लियामेंटरी बोर्ड की एक प्रस्ताव के साथ स्थापना की गई। पूरे हिंदुस्तान में फेडरेशन की ओर से लड़े जा रहे चुनावों कीखातिर प्रांतीय पार्लियामेंटरी बोर्ड तथा प्रांतीय बोर्ड के कामकाज को नियंत्रण में रखने और निर्णय करने के लिए यह स्थापना की गई। उसके बाद व²कग कमेटी का काम संपन्न किया गया।

शाम के समय अहिल्याश्रम के प्रांगण में रा.बी.एन. शिवराज की अध्यक्षता में चुनाव प्रचार के लिए प्रचंड सार्वजनिक सभा का आयोजन किया गया। इस सभा में में डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर विशेष भाषण देंगे। इसकी हस्तपत्रिकाओं द्वारा तथा जनता के पिछले अंक में घोषणा की गई थी सो सभा में बहुत सारे लोग इकट्ठा हुए थे। सभा में आगामी चुनाव और अस्पृश्य समाज का भविष्य विषय पर डा.ॅ बाबासाहेब अम्बेडकर का बेहद ओजस्वी भाशण हुआ। करीब 50 हजार तक जनसमुदाय उपस्थित था। अम्बेडकर की जय के नारों से आकाश गूंज रहा था।

डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर ने अपने भाषण में कहा,

बहनों और भाइयों,

आज की सभा का प्रमुख उद्देश्य है आगामी चुनाव का प्रचार।

आज मैं अस्पृश्य समाज को समय रहते ही सूचना देकर चेताना चाहता हूं। आज जो भाषण हुए वे बेहद महत्वपूर्ण थे। जिन्होंने ये भाषण दिए वे हो सकता है उम्मीदवार हों। इसीलिए बड़े आवेशपूर्ण ढंग से उन्होंने भाषण दिए। लेकिन मैं उम्मीदवार नहीं हूं। (हंसी) मैं चुनावों मेंखड़ा नहीं रहना चाहता। इसीलिए आपको मेरे भाषण में आवेश दिखाई नहीं देगा। आज भले मैं कमांडर-इन-चीफ नहीं हूं लेकिन फिर भी आंशिक रूप ने ही सही मैं अस्पृश्य समाज का नेता हूं। इसीलिए मेरे अनुयायियों के भले के लिए अपने अनुभवों के आधार से सलाह देने के लिए यहांखड़ा हूं।

इन चुनावों को देख कर मुझे एक बात की याद आती है। तुकाराम कह गए हैं कि, ‘आती सिंहस्थ पर्वणी, न्हाव्या, भ्रटा झाली सेजवाणी’ (सिंहस्थयानी नाई, ब्राह्मणों की मेजवानी का समय) ये चुनाव सिंहस्थ का मौका है। अन्य दलों को यह मेजवानी उड़ाने का समय लगता है। लेकिन यह कहावत अस्पृश्य समाज पर बिल्कुल लागू नहीं होती।

केवल ब्राह्मण ही राजनीति जानते हैं ऐसा माना जाता रहा है। राजनीति काखेल

खेलने का अधिकार केवल ब्राह्मणों को ही था, कुछ हद तक यह बात सही थी। क्योंकि लोकल बोर्ड, म्युनिसिपाल्टियां, विधिमंडल आदि के सदस्य केवल ब्राह्मण ही थे। लेकिन मैं अब कह सकता हूं कि इस देश में केवल अस्पृश्य और ब्राह्मण ही राजनीति जानते है।