222 4.10.1945 अपनी उन्नति की खातिर हमें देश को मिलने वाली सत्ता में शामिल होना चाहिए - पुणे - Page 500

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यह फर्क केवल दस सालों में हुआ है। 1892 से लोकनियुक्त पद्धति जारी हुई। धीरे-धीरे हिंदु मुसलमान और ईसाइयों को भी इसमें अपनी तरह से हिस्सा लेने का मौका मिला। अचरज की बात यह थी कि 1935 तक अस्पृश्य समाज को मतदान का अधिकार नहीं था। अर्थात् 1935 तक उम्मीदवार और चुनावों के बारे में उसे कुछ नहीं पता था। 1937 के चुनावों में अस्पृश्य समाज ने मुंबई की 15 में से 15 सीटें जीत लीं। काँग्रेस ने अपनी दो सीटें जीतीं। कुल हिसाब बराबर हुआ। हिसाब के बही-खाते में काँग्रेस को आवक की जगह शून्य दर्ज कराना पड़ा। जो समाज राजनीति को भी नहीं जानता था वह 1937 के चुनावों में पहली बार उतरा और पूरी तरह विजयी हुआ। यह कोई साधारण बात नहीं थी। इस समाज को राजनीति सिखाने की कोई जरूरत नहीं। क्योंकि उसे कोई ठग नहीं सकता। कांग्रेस ने अस्पृश्य समाज को चुनौती दी इसीलिए मैंने ये बातें बताईं।

पिछले करीब 50-60 सालों से कांग्रेस राजनीति में है। कोई भी व्यवहारकुशल व्यक्ति इस बात का हिसाब करता रहता है कि इस प्रदीर्घ काल में इनमें क्या कमाया और क्या गंवाया। हर काणी-उद्यमी हर दीवाली में हिसाब लगाता है इसी तरह उस देश को, हर चतुर व्यक्ति को चाहिए कि वह काँग्रेस की राजनीति का सिंहावलोकन करे।खास कर हिंदु लोग इस बारे में सोचें। यह उनका कर्तव्य है। जिस काँग्रेस बहुत सारे वादे किए उनमें से कितने पूरे किए और कितने नहीं इसके बारे में हिंदू लोग हड़ताल करेंगे या नहीं, यह उनकी सोच और उनका नजरिया है। हमें जरूर इस मसले पर सोचना चाहिए।

काँग्रेस की पड़ताल मैं कर देता हूं ताकि हिंदुओं के दिमाग के तालेखुल जाएंगे। अगर कोई मुझसे पूछे कि काँग्रेस ने जो हासिल किया है उसे क्या आप दो-चार शब्दों में गिना सकते हैं? मैं बता सकता हूं कि काँग्रेस ने ‘पग-पग पराजय’ शुरू से ही उन्होंने जब-जब सिंह की तरह गर्जन किया तब-तब उन्हें औरों के जूते चाटने पड़े। कुछ लोग कह रहे थे कि हमारे नेता नरमवादी हैं। गांधी बहुत तेज हैं- बेहद उग्र। उन्हें कानून तोड़ने हैं, जंगल तोड़ने हैं और कारागार में जाना है। गांधी की ऐसी राजनीति है। गांधी ने लोगों के हाथ में पलीता दिया। 1921 में लोगों ने एक पुलिस थाना जलाया। गांधी बहुत डर गए। उन्होंने उस बात को टाल दिया। 1931 में गांधी ने गोलमेज संमेलन में हिस्सा लिया। वे जब लौटे तो उन्हें कारावास भेजा गया। वे कुछ भी नहीं कर पा रहे थे। कारागार में उनका इतना बुरा हाल हुआ कि आखिर उन्होंने अपनी रिहाई के लिए विलिंग्डन कोखत लिखा। लेकिन वायसराय किसी भी तरह मानने को तैयार न हुआ। गांधी ने बहुतखत लिखे लेकिन उनका कोई असर नहीं हो रहा था। आखिर गांधी ने अपने पुराने दोस्त को जनरल स्मटस् कोखत लिख कर मध्यस्थता करने कि विनती की। जनरल स्मटस् ने मध्यस्थता करते हुए जनरल बिलिंग्डन कोखत लिखा। और इस प्रकार काफी बेइज्जती के बाद गांधी ने अपनी रिहाई कर ली।