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* साम्राज्य से हजारों गुना बुरा है ब्राह्मण्य
31 जुलाई, 1937 को डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर को धुले में कोर्ट के किसी काम के सिलसिले में जाना था। शुक्रवार की रात की गाड़ी से वह वहां से निकले। 31 की सुबह 5 बजे उनकी गाड़ी चालीसगांव पहुंची। डॉ. बाबासाहेब की गाड़ी, चालीसगांव होते हुए आगे धुले जाएगी इस बात कीखबर लगते ही बड़ी संख्या में लोग तड़के ही से चालीसगांव स्टेशन परखड़े उनका इंतजार कर रहे थे। अचानक स्टेशन परिसर लोगों से खिल उठा था। लोग डॉ. अम्बेडकर की जय के नारे लगा रहे थे।
ठीक 5 बजे गाड़ी ने स्टेशन में प्रवेश किया। सुहास्यवदन डॉ. साहब गाडी से उतरे। तुरंत तीन बार ‘‘अम्बेडकर जिंदाबाद’’ का नारा गूंजा। पहले मे. एस. एस. कर्णिक, चीफ ऑफिसर और अस्पृश्योद्धारक बोडिंग बिल्डिंग फंड कमेटी के सचिव और मे. चव्हाण (चौहान) ने उनका साक्षात्कार किया। उसके बाद श्री दीवाण चव्हाण के बो²डग की ओर से लाया गया हार श्री डी. जी. जाधव, बीए, एमएलए ने डॉ. साहब के गले में हार पहनाया। उसके बाद रांजणगाव की बहन श्री सखुबाई कबडद्यकर, सोनाबाई कन्नड़कर, सावित्रीबाई अहिरे आदि बहनों ने उनकी आरती उतारी। उन्हें वंदन किया। छात्रों की ओर से वेडाबाई सरदार शांताबाई चव्हाण, शांताबाई जाधव ने उन्हें फूलमालाएं अर्पण कीं। कई लोगों को लगा था कि बाबासाहेब अस्पृश्योद्धारक बो²डग देखने आएंगे इसलिए वे बो²डग के परिसर में बड़ी संख्या में इक्ट्ठा होकर डॉ. बाबासाहेब का इंजतार कर रहे थे। इसलिए श्री शामराव कामाजी जाधव और श्रावण धर्मा जाधव ने उसे विनति की कि वे बो²डग देखने चलें। लेकिन समयाभाव के कारण पहले इंकार करने के बाद अग्रह के कारण रात 8.30 बजे वहां जाने की बात मान ली। सो, बो²डग परिसर में इक्ट्ठा लोग गगनभेदी आवाज में जयकार करते हुए स्टेशन तक चले आए। डॉ. बाबासाहेब पर अस्पृश्यता लोगों का प्रेम और उनके काम के बारे में लोगों का उत्वाह देखकर चालीसगांव के स्पृश्य लोग आश्चर्यचकित थे। उनके दर्शन पाने के लिए अस्पृश्य लोगों का यह उत्साह प्रशंसा योग्य नहीं ऐसा कौन वह कह सकेगा? इससे पहले किसी भी काम के सिलसिले में बाबासाहेब इस ओर नहीं आए थे। कोर्ट के काम के लिए वे जब जा रहे हो तब भी उनकी एक झलक पाने की लोगों
* जनताः 7 और 14 अगस्त, 1937