480 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
जो मिले उसे लेते हुए बाकी जो बचता है उसके लिए संघर्ष करते रहना है यह लो. तिलक का मानना था। गांधी की आज्ञा के अनुसार ब्रिटिश साम्राज्य की अड़चन हमारे लिए मौका है इस सूत्र को काँग्रेस ने अपनाया। 1939 में युद्ध की शुरूआत हुई। 1939, 1940, 1941 में काँग्रेस ने कुछ नहीं किया। 1942 के आधे बीत जाने तक वे चुप रहे। अगस्त 1942 में प्रस्ताव पारित कर हर दरवाजे पर ‘चलेजाव’ ‘चलेजाव’ लिखा गया। केवल दरवाजे पर ‘चलेजाव’ ‘चलेजाव’ लिख कर अगर किराएदार चला जाता तो उसे निकालने के लिए कोर्ट में नहीं जाना पड़ता।
8 अगस्त को 10 बजे प्रस्ताव पारित हुआ और 11 बजे वारंट निकाल कर काँग्रेस के नेताओं को कारागार भेजा गया। बाकी जो बाहर बचे उन्होंने आंदोलन किए। उन्होंने आगजनी, लूट और अत्याचार किए। उन्होंने कोर्ट - कचहरियां जला दीं, रेल की पटरियां उखाड़ दीं। डाक-तार विभाग केखंभे उखाड़े। लाखों रुपयों का नुकसान हुआ? कोर्ट-कचहरियां किसके पैसों से बनाए गए थे? लोगों के पैसों से ही न! क्या यह सच नहीं है? रेल की पटरियां बिछाने में किसका पैसा लगा था? लोगों का ही न? क्या यह सच नहीं है? फिर काँग्रेस ने जनता को नुकसान पहुंचाया या अंग्रेज सरकार को? जो नुकसान किया गया उससे अंग्रेजों का कोई नुकसान नहीं हुआ। जो भी नुकसान हुआ वह इस देश की गरीब जनता का नुकसान हुआ। काँग्रेस के जो लोग कारागार में थे उनका क्या हाल था? कारागार में उनका बड़ा अच्छा हाल था। जवाहर आदि को अहमदनगर के कारावास में रखा गया था। उनके लिए दि८ी से बेहतरीन किस्म के चावल मंगाए जाते थे। गांधी का भीखूब ख्याल रखा जा रहा था। इसके बावजूद आखिर गांधी ने वाइसराय कोखत लिख कर विनति की कि मुझे रिहा करें। लेकिन वायसराय कुछ सुनने के लिए तैयार नहीं था। कम से कम मुझसे एक बार मिल लें, ऐसा भी गांधी ने लिखा लेकिन उसका भी कुछ असर नहीं हुआ। आखिर किसी तरह गांधी ने अपने को रिहा करवा लिया।
1945 में सिमला कॉन्फ्रेंस का क्या हुआ इस बारे में सोचने हैं। एसेंब्ली का नियम था कि वाइसराय जब प्रस्ताव पढ़ कर सुनाते तब सब लोगों को उठ करखड़े रहना पड़ता था। नियमानुसार हम सब उठ करखड़े रह जाते थे। काँग्रेस के लोग बैठे रहते थे।
खड़े रहने में उन्हें शर्म आती थी। उनका कहना था कि हम वायसराय को नहीं मानते। इसलिए हम उनके आगेखड़े नहीं रहेंगे। लेकिन शिमला कॉन्फ्रेंस में हमने क्या देखा? वाइससॉय ने जैसे ही घोषणा की काँग्रेस के सभी नेता सिमला दौड़ पड़े। कोई गाड़ी में बेठ कर गया, कोई घोड़े की सवारी लेकर गया तो कोई गधे पर बैठकर गया। सब लोगों ने सिमला में भीड़ लगा दी। शिमला में इतनी भीड़ हुई कि उन्होंने शिमला को गंदा कर दिया। वाइसराय को न माननेवाले लोग उनके घर के पास धरना देकर बैठे रहे।
गांधी की राजनीति ऐसी है। यह हारे हुओं की राजनीति है। काँग्रेस के लोग राजनीति