482 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
और धार्मिक उद्धार होना असंभव है। हमें अगर समता और आजादी प्राप्त करनी हो, अपनी उन्नति करनी हो तो इस देश को मिलने वाली सत्ता में हमें हिस्सेदार बनना ही पड़ेगा। राजनीतिक सत्ता प्रभावी शस्त्र है। इस शस्त्र को हमें भगवान के समान मानना होगा। इस शस्त्र की हमें पूजा करनी चाहिए। ताकि अपने दुश्मन पर हम इसे प्रयोग कर सकें। इस शस्त्र को आगामी चुनावों के जरिए हासिल किया जा सकता है। इसीलिए आगामी चुनाव हमारे जीने-मरने की आर-पार की लड़ाई है। इन चुनावों पर हमारे जीने-मरने का मसला निर्भर करता है। जीवन-मृत्यु के भयंकर संग्राम में हमें जीतना ही होगा। इस युद्ध को जीतने के लिए हमें जोरदार तैयारी करनी होगी। हमें अभी से इस काम में लग जाना चाहिए।
अभी हिंदुस्तान का कामकाज देखने के लिए कुल 15 मंत्री हैं। उन 15 में से एक मैं भी हूं। आप इस बात को जानते हैं न? वायसरॉय के कार्यकारी मंडल में मैं केवल दो सालों से ही हूं। लेकिन इन दो सालों में मैंने आपके लिए क्या किया? आज तक कभी किसी ने अस्पृश्यों की शिक्षा की जिमेदारी जो नहीं ली थी वह अब केन्द्र सरकार ने ली है। बनारस हिंदू विश्वविद्यालय बनाने के लिए हिंदुस्तान सरकार ने 20 लाख रुपए दिए। अभी भी उस विश्वविद्यालय का 41 हजार रुपयों का बिल सरकार के पास आकर पड़ा हुआ है। अलीगढ़ विश्वविद्यालय बनाने के लिए मुसलमानों को 20 लाख रुपए दिए गए थे और हर साल 3 लाख रुपए केन्द्र सरकार देती है। अस्पृश्य समाज की शिक्षा की जिम्मेदारी भी अपने ऊपर है इसका सरकार को अहसास तक नहीं था। मेरे जाने के बाद मैंने अस्पृश्य समाज की शिक्षा के लिए 3 लाख रुपए मंजूर करवा लिए। इन तीन लाख रुपयों में हर साल 300 छात्र पढ़ सकते हैं। इस बार 300 छात्र उच्च शिक्षा के लिए विदेश जाने वाले हैं। उसी प्रकार हर साल 15 छात्र उच्च शिक्षा के लिए विदेश जा सकते हैं। हममें से क्या कोई विलायत गया है? साहब के बुटलेट के रूप में हो सकता है कोई गया हो। इस बार शिक्षा के विदेश जाने वाले 30 छात्रों में एक भंगी, एक मांग और कई सारे चमार जाति के हैं। मैं यही बताना चाहता हूं कि इस योजना का फायदा अस्पृश्यों में से हर जाति ले सकती है।
प्रॉविन्शियल सर्विसेस में और सेंट्रल सर्विसेस में 25 प्रतिशत पद मुसलमानों के लिए आरक्षित रखे गए हैं। इसी प्रकार ईसाई सिक्ख और एंग्लो इंडियनों के लिए नौकरियों में तय प्रतिशत का आरक्षण है। लेकिन क्या कभी किसी ने अस्पृश्य समाज की ओर ध्यान दिया हैघ् क्या कभी हमारे लिए कोई सुविधा दी गई? एक टुकड़ा तक कभी हमें नहीं दिया गया था। मैंने ऐसी व्यवस्था करवा ली है। अस्पृश्यों के लिए नौकरियों में आठ पूर्णांक एक तिहाई प्रतिशत आरक्षित करवा दिया है। मेरे सरकार में शामिल होने के बाद से कई लोग बड़े ओहदों पर चले गए हैं। हम में से एक डेप्युटी सेक्रेटरी है। तीन गवर्नमेट ऑफ इंडिया है। दूसरा एक अंडर सेक्रेटरी है। तीन एक्जिक्युटिव इंनीनियर्स हैं। शिमला में मेरे विभाग का एक हिस्सा है जहां 28 क्लर्क हैं जिनमें से 18 भंगी जाति के हैं।
राजनीतिक सत्ता के सहारे इन्सान क्या कर सकता है इसका यह अच्छा उदाहरण