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हिंद भू के गिने-चुने सुपुत्रों में से आप एक हैं। उच्च विचार, प्रभावपूर्ण लेखन, अचूक नेतृत्व आदि आपके अमूल्य गुणों के कारण इस हिंदी देश के नागरिकों के मन में आपके बारे में गर्व है। बहुसंख्यकों की अत्याचारी पकड़ से असहाय अल्पसंख्यकों को आपने छुटकारा दिलाया। विधायक सूचना देकर, राजनीति के प्रदीर्घ अध्यवसाय के कारण अचूक मार्गदर्शन और राजनीति की उलझने सुलझाने की सामर्थ्य और कुछ प्रस्थापित करने की लगन के कारण आपने उन्हें छुटकारा दिलाया। संक्षेप में, आप अस्पृश्यों के उद्धारक हैं। दुर्भागी हिंदवासियों को प्रगति पथ पर ले जाने के लिए आप चिरायु हों, यही हमारी कामना है।
हम हैं-
चेअरमन, वाईस चेअरमन
और म्युनिसिपल कमेटी के
सदस्य, अमदाबाद
अमदाबाद, 30-11-1945
मानपत्र का जवाब देते हुए डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर ने कहा,
‘‘मैं जिस मुंबई शहर में रहता हूं वहां की म्यूनिसिपालिटी ने मुझे मानपत्र देने के बारे में रखे गए प्रस्ताव पर सोचने से भी इन्कार किया। इसके लिए मैं उस म्युनिसिपालिटी को बिल्कुल दोष नहीं दूंगा। मैंने अपने जीवन में कभी इस बात को महत्व नहीं दिया कि मेरी सेवा का मोल हो। लेकिन, आपकी म्युनिसिपालिटी द्वारा किए गए बर्ताव के बीच का फर्क ध्यान देने योग्य जरूर है।
कानून और व्यवस्था के बारे में इस देश में कोई आस्था भाव नहीं है। 1942 के आंदोलन के दौरान राज्य का कामकाज चलाने में और देश में शांति कायम करने में जिन्होंने मदद की थी वह कुछ भावुक होगों को पसंद नहीं आया था। लेकिन 1942 के आंदोलन में कानून का सम्मान करते हुए जिन्होंने व्यवस्था को बनाए रखा उनका बर्ताव सही था और अपने योग्य बर्ताव के साथ उन्होंने देश का हित साधा यह जरूर मानना पड़ेगा। देश की राजनीति में गड़बड़ी पैदा होकर देश की कानून और व्यवस्था के लिए अगर जौखम पैदा हो तो देश में पैदा होने वाले अराजक को जड़समेत नष् करने की कोशिश करना राजनीति में कार्यरत पुरुषों का कर्तव्य बनता है। अगर इस कर्तव्य को वे पूरा नहीं कर पाते तो यह साबित होता है कि राजनीति में रहने के योग्य वे नहीं हैं। अगस्त 1942 के आंदोलन के बाद देश में जो अराजक पैदा हुआ था उस समय देश में व्यवस्था कायम करने के लिए हम अगर सहयोग नहीं देते तो जापान या जर्मनी हिंदुस्तान की हालतखराब कर देते। ऐसी दुर्दशा से हिंदुस्तान को बचाना क्या देश-सेवा नहीं है?