225 30.11.1945 चुनावों के जरिए ही राजनीतिक सत्ता हासिल की जा सकती है - अमदाबाद - Page 511

490 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

था फिर भी बाबासाहेब ने बिना आराम के कई सारे काम निपटाए। सुबह से लेकर शाम तक कई कार्यक्रम रखे गए थे। हालांकि समयाभाव के कारण कई कार्यक्रम रद्द करने पड़े। दोपहर में रखिया रोड की श्रमिकों की चॉल में भोजन का कार्यक्रम रखा हुआ था। डॉ. बाबासाहेब के आग्रह के अनुसार दाल-चावल-सब्जी का सादाखाना ही बना था। फेडरेशन के कार्यकर्ता और प्रतिनिधि भी उपस्थित थे।खानाखाने के बाद गुजरात के कार्यकर्ताओं ने अपने विचार प्रकट किए। आखिर में बेहद सादी, सरल गुजराती भाषा में बाबासाहेब ने फेडरेशन के काम के बारे में बताया तथा आगामी चुनावों को लेकर कुछ निर्देश दिए। वहां से तुरंत वह अहमदाबाद म्युनिसिपालिटी के मानपत्र समारोह में गए। समारोह पूरा होने के बाद वह तुरंत परिषद के लिएखासखड़े किए गए बुद्ध नगर गए। वहां उनके पहुंचने से पूर्व कई गुजराती कवियों और शाहीरों ने सामाजिक क्रांति के गीत गाकर श्रेताओं में उत्साह भर दिया था। डॉ. बाबासाहेब का आगमन हुआ तो लोगों ने जयघोष के नारों से वातावरण भर दिया। स्वागताध्यक्ष श्री. पी.एम. पटनी के भाषण के बाद, जयघोष और तालियों की गूंज के बीच डॉ. बाबासाहेब भाषण देने के लिए खड़े हुए। लाऊड स्पीकर्स की व्यवस्था की गई भी सो बुद्ध नगर के विशाल प्रांगण में फैले जनसमुदाय ने उनका भाषण शांति और भक्तिभाव के साथ सुना।

डॉ. बाबासाहेब ने अपने भाषण में कहा,

भाइयों और बहनों,

अध्यक्ष ने मुझसे विनति की है कि मैं गुजराती में बोलूं। मैं हिंदी में बेहतर ढंग से बोल पाता। गुजराती में भी बोल सकता हूं लेकिन इधर थोड़ी भूल-भाल गया हूं। इसके बावजूद मैं गुजराती में बोलने की कोशिश कर रहा हूं। आज यहां इक्ठ्ठा हुआ जन-सैलाब देख कर मुझे 1926 साल की याद आती है। अस्पृश्य छात्रों के बो²डग के काम के सिलसिले में मैं यहां आया था। जो लोग मुझे जानते थे उन्होंने मुझसे मिल कर एकाध सभा लेने की विनति की थी। मैंने उनसे कहा, यह शहर तो काँग्रेस का मायका है। यहां के लोग काँग्रेसी के रूप मैं जाने जाते हैं और में काँग्रेस विरोधक के तौर पर मशहूर हूं। हालांकि, उन लोगों का आग्रह देख कर मैं सभा में उपस्थित रह कर बोलने के लिए तैयार हुआ। यहां के एक विशाल सभागार में सभा का आयोजन किया गया था। अध्यक्षस्थान पर हमारे ही एक पुराने कार्यकर्ता की योजना की गई थी। अपने अनुभव के आधार से मैं इस सभा में बोला। अध्यक्ष ने अपने भाषण में मुझे समझाया कि, ‘‘हम सब गांधीजी की प्रजा हैं। हम गांधीजी का साथ नहीं छोड़ सकते। आप अगर इस प्रकार की कोशिश करेंगे तो ठीक नहीं होगा।’’ मुझे उनके ये उद्गार अच्छी तरह याद हैं। उस सभा में आपमें से कोई उपस्थित था तो वह भी इस बात की पुषि् करेगा। बीस साल पहले का वह अनुभव और आज की इस सभा में उपस्थित यह जन-सैलाब देख कर मुझे लगता है कि ‘सत्य कभी