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नष् नहीं होता। कभी ना कभी वह उजागर हो ही जाता है।’ आज 1945 का साल चल रहा है। यहां जमा भीड़ को देख कर लगता है कि काँग्रेस का केन्द्र रहे इस अहमदाबाद शहर में अस्पृश्य लोग काँग्रेस के विरोध का सामना करने के लिए सिद्ध हो चुके हैं। यही वह सत्य है (तालियां) आगामी चुनावों के बारे में आज मैं बोलने वाला हूं। मैं किसी पर टीका-टिप्पणी करना नहीं चाहता लेकिन आज यहां यह बताना मैं जरूरी समझाता हूं कि पिछले बीस सालों की गांधी की कुटिल राजनीति और अस्पृश्य निरोधी षड्यंत्रों का इतिहास बताए बगैर कोई चारा नहीं। क्योंकि उसके बगैर मैं जो कह रहा हूं उसका मतलब आपकी समझ में नहीं आएगा। इसलिए कहता हूं कि जो मुझे बताना है वह कटु सत्य है यह तभी आपकी समझ में आएगा जब आप गांधी की कुटिल राजनीति और अस्पृश्यों के विरोध में किए गए उनकी कारस्तानी के बारे में जानेंगे।
कहते हैं कि गांधी अस्पृश्यों के उद्धारकर्ता हैं। पिछले बीस वर्षों से मैं यही सोच रहा हूं कि गांधी अस्पृश्यों का उद्धार कैसे करेंगे? क्या वह सचमुच ऐसा ही चाहते हैं? इस बात पर हमें गौर करना होगा। गोलमेज परिषद में हम हिस्सा लेने गए थे तब गांधी ने घोषणा की थी कि राजनीतिक उन्नति से नहीं वरन सामाजिक सुधार द्वारा ही अस्पृश्योद्धार संभव है। गांधी की नजर में यह कैसे संभव है यह वेखुद ही जाने लेकिन मेरी पक्की धारणा है कि राजनीतिक हकों के बगैर उन्नति कर पाना असंभव है। (तालियां)। गांधी ने 1919 में काँग्रेस में कदम रखा और 1920 में असहकारिता आंदोलन दिया। बार्डोली के सत्याग्रह में लाखों रुपया इकठ्ठा कर घोषणा की कि अंग्रेजों को देश से भगा देंगे। तब उन्होंने यह घोषणा भी की थी कि हिंदु-मुसलमानों की एकता और अस्पृश्यता व जातिभेद केखात्मे के बगैर स्वराज नहीं मिलेगा। लेकिन, जातिभेद और अस्पृश्यता कोखत्म करने के लिए उन्होंने किया क्या? एक मामूली कमेटी की स्थापना के जरिए अस्पृश्योद्धार करने की बात गांधी ने और काँग्रेस ने तय की। लेकिन उस कमेटी ने किया कुछ नहीं, और काम को अधूरा छोड़ दिया। इस काम को फिर उन्होंने हिंदू महासभा को सौंपा। अन्य कामों में लाखों रुपयाखर्च किया लेकिन अस्पृश्योद्धार के लिए 30 हजार रुपये हीखर्च किए। उनकी नजर में यह काम इतना ही महत्वपूर्ण है। यह अब मैंने हाल ही में प्रकाशित हुई मेरी किताब (What Congress and Gandhi have done to the Untouchables) में मैंने इन सभी बातों को साधार स्पष् किया है। 1920 से 1932 के दरमियान उन्होंने अस्पृश्यता निवारण की हांकने के अलावा कुछ नहीं किया। अस्पृश्यों के पृथक राजनीतिक अधिकारों के खिलाफ मेरे साथ झगड़ा किया। हिंदुओं से अस्पृश्य वर्ग के अलग हो जाने के कारण हिंदू निर्बल न बनें इसलिए गांधी ने ये टवड़ा के कारागार में ही आमरण अनशन किया और तब हुए करार से हरिजन सेवक संघ का निर्माण हुआ। तब से अब तक 13 सालों में इस संघ ने अस्पृश्यों के लिए क्या किया? यह सवाल मैं सार्वजनिक रूप से पूछ रहा हूं। बताइए कि आपकी शिक्षा के लिए उसने कौन-सा बड़ा काम किया है? हमारे हाथ