492 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
अगर सत्ता हो तो हम क्या कर सकते हैं उसके उदाहरण के रूप में पिछले तीन सालों में किया गया मेरा काम आपके सामने है। इन तीन सालों में मैंने हमारे बच्चों की पढ़ाई के लिए हर वर्ष तीन लाख रुपये इकठ्ठा किए। इस बार पांच लाख रुपय मिलेंगे। आज की तारीख में 500 छात्र कालेजों में पढ़ रहे हैं और तीस छात्र उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए विलायत गए हुए हैं। आपखुद तुलना कीजिए आप समझ जाएंगे कि यह काम गांधी या काँग्रेस ने नहीं किया है। हरिजन सेवक संघ के कार्य से मैं समझ नहीं पा रहा हूं कि हमारा उद्धार कैसे होगा? तीन चार रुपयों के वजीफे और मंदिरों के पटखोल दिए जाने का दिखावा और इन नाकाफी बातों का ह८ा मचाना! इससे क्या होगा? ऐसा जताया जाता है कि अस्पृश्यों के लिए मंदिरों के दरवाजेखोल दिए हैं लेकिन असल में क्या होता है? स्वाभिमानी अस्पृश्य इन मंदिरों की ओर ताकते भी नहीं! त्रावणकोर के अलावा और कहां और कौन-से मंदिरखोले गए? जिनमें ‘कुत्रों अनेकगधेड़ो’ जाते हैं वहीं मंदिर
खोलें न? (हंसी) सामाजिक सुधार का ये लोग जो ढोल पीटते रहते हैं उसका यह हाल है। अब राजनीति की ओर चलिए। 1932 में गोलमेज परिषद में मैंने इस बात को लेकर जोरदार संघर्ष किया, मुसलमान-ईसाई जैसे अल्पसंख्यकों की ही तरह अस्पृश्यों को भी राजनीतिक अधिकार मिलने चाहिए। और आज कुछ मूर्ख और बदमाश लोग जनता के बीच इस बात का ढिंढोरा पीटते फिर रहे हैं कि अस्पृश्यों के लिए ये राजनीतिक अधिकार गांधी ने दिलाए हैं। यह साफ झूठ है। सूई की नोक जितना भी राजनीतिक अधिकार अस्पृश्यों को ना मिलें इसिलिए मुसलमानों के साथ गुप्त रूप से सम्पर्क करने वाले गांधी ने नहीं, अस्पृश्यों के लिए ये राजनीतिक अधिकार मैंने दिलाए हैं। (तालियां)। जातीय निर्णय के कारण हमें पृथक चुनाव क्षेत्र मिला था। उसके सहारे हम अपना योग्य प्रतिनिधि चुन कर दे सकते थे ही, साथ ही हमें प्राप्त सार्वजिक मताधिकार का भी इस्तेमाल कर सकते थे। लेकिन गांधी ने प्रायोपवेशन की धमकी दी । उससे पूर्व ‘अम्बेडकर किस झाड़ की पत्ती है’ कहने वाले काँग्रेस के लोग डर गए और कहने लगे कि अम्बेडकर कृपा कीजिए। गांधी मर रहा है, उसे बचाइए। लेकिन मेरे सामने अकेले गांधी की जान से बड़ा सवाल दस करोड़ अस्पृश्यो के हित का था। गांधी व्याकुल हुआ और कहा, अम्बेडकर मेरी जान तुम्हारे हाथ में है। इसलिए मैने दुबारा करार किया। लेकिन गांधी ने क्या किया? अहसानमंद होना तो दूर रहा, गांधी ने कृतघ्नता की। अस्पृश्यों के साथ विश्वासघात किया। आपके राजनीतिक हकों का विरोध नहीं करूंगा इस अपने दिए बचन को धता बता कर काँग्रेस ने हमारे उम्मीदवारों के विरोध में स्वार्थी और नालायक लोगों कोखड़ा किया। जरा सोचिए, यह क्या हुआ? मैंने यह सब क्यों पाया?
हर गांव की यही हकीकत है। ऐसा एक दिन भी नहीं गुजरता कि जब हम पर अत्याचार नहीं होते। यही पास के एक गांव के लोगों के साथ जो हुआ वह सुन कर आपको गुस्सा आ जाए। वहां के अस्पृश्य लोगों का सामाजिक बहिष्कार किया गया। लगातार इक्कीस