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आदि। राजनीति के ताले की चाभियां अगर काँग्रेस के हाथ आएं तो हमारी पुराने जमाने से चली आई गुलामी आगे हमेशा के लिए हमारे साथ चस्पां कर दी जाएंगी। झाडू लगाना, नालियों की सफाई जैसे काम हम पर थोप दिए जाएंगे और पता नहीं हमारे बुरे हालात किस हद तक और गिरते जाएंगे।
इतनी सारी कोशिशों कर मैंने सरकारीखाते से 3 लाख रुपये हमारे समाज के इन बच्चों के लिए रखी है जो विदेष जाकर पढ़ना चाहते हैं। इन 3 लाख रुपये के 5 लाख रुपये बनाने की कोशिशों में मैं आजकल लगा हुआ हूं। इसी प्रकार करीब आठ प्रतिशत सरकारी नौकरियां अपने उम्मीदवारों को मिलने की सुविधा निमार्ण की गई है। हमारी उन्नति के लिए आजतक इन तथा इन जैसी और रियायतें और सरकारी मदद मिली और मिल रही है वह सब तब नेस्तनाबुत होगा जब राजनीति की चाभियां कांग्रेस के हाथ चली जाएंगी।
मैं इतनी सारी कोशिशों क्यों कर रहा हूं? हमें मौके की जगहें, अधिकार के पद पाने हैं इसलिए। इसके बगैर हमारे लिए कोई चारा नहीं। किले से ही दुश्मन के सैनिकों की शेह लेकर इन पर जोरदार हमला किया जा सकता है। दुश्मन अगर पूरा प्रांत काबिज कर ले और किले हमारे पास हैं तब तक किसी बात से डरने की जरूरत नहीं होती। पेशवाओं के युग में अंग्रेजों की सत्ता नहीं थी। मुसलमानों का राज भी नहीं था। उस वक्त संपूर्ण स्वराज था। उस स्वराज में हमारी क्या स्थिति थी?
अस्पृश्य जाति का व्यक्ति सड़क पर थूके नहीं इसलिए उसके गले में भटकी बंधी थी। सड़क पर चलते हुए उनके पैरों के निशान न बने इसलिए पीठ पर झाडू बंधा था। पेशवाओं के राज में अस्पृश्यों का जो बुरा हाल हुआ था वैसा ही बुरा हाल अस्पृश्यों का होने वाला है यह किसी को भी भूलना नहीं चाहिए। शिक्षापात्र से गुजारा चलाने वाले यही ब्राह्मण अधिकारियों से लेकर कलर्क के पद तक के पद हथिया कर अनपा स्थान पक्का किए बैठे हैं।
किसी गांव में मुसलमान का एक ही परिवार भी अगर रहता है तो इसी गांव में रहने वाले हजार-पांच सौ स्पृश्य हिंदू लोग उनकी कितनी लब्बो-चप्पों करते हैं। उनके सामने छींकने तक की किसी की हिम्मत नहीं होती। उसी गांव में रहने वाले पांच-पच्चीस स्वधर्मी अस्पृश्य लोगों को वे ही स्पृश्य हिंदू लोग छोकर से उडाते हैं। अंग्रेजों के शा सनकाल में स्वराज मांगने वाले इन हिंदुओं के हाथ अगर स्वराज गया तो सोचिए कि अपना क्या हाल होगा।
हिंदुस्तान में युरोपीयन, मुसलमान, सिक्ख, एंग्लो इंडियन, पारसी, ईसाई आदि अल्पसंख्यक जातियां है। राजनीति का सामान्य ज्ञान रखने वाला कोई भी इन्सान आपको सहज ही बता सकता है कि इनमें से असल में किसी जाति को राजनीतिक सुरक्षा की जरूरत है तो वह है अस्पृश्य समाज को ही है। ऐसी स्थितियों में आज तक काँग्रेस के लोग क्या करते रहे हैं? 1930-32 में विलायत में जो राऊंड टेबल कॉन्फरंस हुई थी उसमें अस्पृश्स्य लोगों