500 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
की ओर से मुझे शामिल होना पड़ा था। उस वक्त गांधी ने क्या किया था?
ईसाई, युरोपीयन, पारसी, सिक्ख, मुसलमान आदि अल्पसंख्यकों ने राजनीतिक सुरक्षा पाने के लिए पत्र भेजे। मुसलमानों के अलावा अन्य सभी की मांगे मान ली गईं। मैंने भी अर्जी भेजी थी। उस अवसर पर गांधी को डर लगता था कि ये सभी लोग एक हो जाएंगे। और अगर ऐसा हुआ तो ये काँग्रेस का भट्टा बिठा देंगे, काँग्रेस के बाराह बजेंगे। इसीलए गांधी ने मुसलमानों के साथ गुप्त करार किया। उनसे कहा गया कि- आपकी सभी 14 मांगें हमें मंजूर हैं लेकिन आपको अस्पृश्यों की मांग का विरोध करना होगा। असल में मुसलमानों की जनसंख्या और अस्पृश्यों की जनसंख्या लगभग बराबर है और राजनीतिक सुरक्षा की जरूरत अस्पृश्यों को ही अधिक है। लेकिन इस प्रकार गांधी ने सभी पार्टियों की अर्जी को मंजूर कर मुसलमानों से गुप्त करारनामा किया और मेरी अर्जी नामंजूर की।
ऐसी है गांधी की कपटनीति। कुछ दिनों पूर्व शिमला में जो परिषद हुई उसमें भी गांधी ने अलग क्या किया?
वाइसराय साहब ने परिषद के बारे में सरकारी नीति की घोषणा करने वाला एक सूचना पत्र निकाला था जिसमें उन्होंने राजनीतिक दृष्किण से अस्पृश्य एवं अस्पृश्येतर हिंदू इस प्रकार हिंदू समाज के दो हिस्से करने वाला शब्द समूह का प्रयोग किया था। धार्मिक नजरिए से अस्पृश्य लोग हिंदुओं से सचमूच अलग हैं या नहीं इस बात को थोड़ी देर नजरंदाज भी कर दिया जाए तब भी राजनीतिक नजरिए से अस्पृश्य समाज स्पृश्य हिंदू समाज से अलग माना गया था। लेकिन कुल राजनीतिक आंदोलन तता वाइसराय के सूचना -पत्र से गांधी की ‘अंदरूनी आवाज’ जाग गई। फिर गांधी ने एक सूचना-पत्र निकाल कर उसके जिरए घोषणा की कि, अस्पृश्य और अस्पृश्येतर हिंदू या सवर्ण हिंदू इस शब्द समूह का प्रयोग राजनीतिक तौर पर हिंदू समाज को दो हिस्सों में बांटने वाला होने के कारण गैर-वाजिब है।
इसकी जड़ क्या है? कौरव-पांडवों के युद्ध के बारे में आप थोड़ी-बहुत जानकारी रखते ही होंगे। कौरव सौ थे और पांडव पांच। कौरवों ने पूरे राज्य पर कब्जा किया हुआ था। इस राज्य का कुछ हिस्सा पांडवों को मिले, युद्ध टाला जाए इसके लिए श्री कृष्ण बीच बचाव करने के लिए कौरवों के नेता दुर्योधन के पास गया। उसने दुर्योधन को बताया कि, आधा राज आप रखिए और आधा पांडवों को दीजिए। लेकिन दुर्योधन ने उनकी बात नहीं मानी। हम पर कृष्ण ने कहा कि इस राज्य का दण्डकारण्य तो पांडवों को दीजिए। इस पर दुर्योधन ने जवाब दिया कि दण्डारण्य तो दूर सूई की नोक पर जितनी मिट्टी आए उतनी जमीन भी मैं पांडवों को नहीं दूंगा।
गांधी और काँग्रेस के लोगों की अस्पृश्यों के बारे में यही मानासिकता है। इसका कारण क्या है?