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बाबासाहेब को 1101 रुपयों की थैली अर्पण की गई।
ठीक साढ़े सात बजे डॉ. बाबासाहेब बोलने के लिए उठखड़े हुए। तालियों की गड़गड़ाहट हुई और वातावरण ‘अम्बेडकर जिंदाबाद’ अम्बेडकर कोन हैं, दलितों के राजा हैं, जैसे नारों से गूंजता रहा। जनसमुदाय शांत हुआ तो बाबासाहेब ने अपना भाषण शुरू किया। उन्होंने कहा,
भाइयों और बहनों,
अब तक के वक्ताओं ने जो कुछ कहा उससे मेरी भूमिका स्पष्ट हो चुकी है। सो, उसके बारे में बिना और कुछ कहे इलेक्शन के बारे में बोलूंगा। आप जानते ही हैं कि आज का इलेक्शन 1937 के इलेक्शन से बिल्कुल अलग है। इस बार इलेक्शन दलितों के जीने-मरने का मसला है। इस मसले को हल कर हमें अपने जीवन के अद्य कर्तव्य-कर्म को निभाना होगा। दुनिया को हमारे, अभेद्य संगठन की मिसाल देनी ही होगी। यानी कि, जाहिर है- फेडरेशन के सभी उम्मीदवारों को जिता कर हमें अपने राजनीतिक अधिकार हासिल करने हैं।
राजनीतिक सत्ता हाथ में हो तो आदमी क्या कर सकता है इसका एक उदाहरण में आपको बताता हूं। वायसराय के जिस कार्यकारी मंडल में मेरा प्रवेश हुआ है उसके 15 सदस्य हैं। हममे से मैं अकेला ही हूं। इस बात को ढाई साल बीत चुके हैं। मेरे वहां जाने से पहले केन्द्र सरकार ने अस्पृश्यों की शिक्षा की कोई जिम्मेदारी अपने सिर नहीं ली थी। लेकिन सरकार ने मुसलमानों के अलीगढ़ विश्वविद्यालय को 20 लाख रुपयों की और बनारस हिंदु विश्वविद्यालय को 19 लाख रुपयों की मदद दी थी। इसके अलावा इन दोनों संस्थाओं को हर वर्ष 3 लाख रुपयों की मदद देना बरकरार है। साथ ही 60 रु. प्रति छात्र के हिसाब से 300 कॉलेज वजीफे मंजूर किए गए हैं। छात्रों की भरपूर मदद करने की नीति बनाई गई है। इसी वर्ष 30 छात्र उच्च शिक्षा पाने के लिए विलायत जाएंगे। अब ऐसी व्यवस्था की गई है कि कम से कम 2 वर्षों में 15 अस्पृश्य छात्र यहां से पढ़ने के लिए विलायत जाएंगे। ऐसी व्यवस्था यहां पहले कभी नहीं थी लेकिन आज हुई है। अब नौकरी के बारे में देखिएं मुसलमानों को सैंकड़ा 20, ईसाइयों को 8.50 प्रतिशत लेकिन हमारे लिए कुछ नहीं। बस सिफारिश की गई थी कि इनकी तरफ ध्यान दें। हाल ही में सरकार को मेरी मांग उचित लगी और हमारे लिए नौकरियों में आठ पूर्णांक एक तिहाई आरक्षण को मंजूरी मिली। मैं जब वहां गया तब मेरे विभाग में अस्पृश्य हमाल तक नहीं थे। लेकिन अब 2 डेप्युटी सेक्रेटरी, 1 अंडर सेक्रेटरी और 3 एक्झीक्युटिव इंजीनियर्स इस प्रकार अस्पृश्यों की भर्ती की है। कोई कहते हैं कि मैं केवल महारों का ही हित करता हूं। मैं महार जाति