36 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
इस पक्ष का कहना मानना पड़ेगा। सोचिए यह असर किस बात का है? यह और किसी बात का नहीं, हमारे संगठन का असर है।
काँग्रेस हिन्दुओं की संस्था है। आज तक हिन्दुस्तान पर अंग्रेज सरकार का राज था। इसी कारण इन लोगों के हाथ में राजनीति के सूत्र नहीं थे। लेकिन आज हिन्दुस्तान पर नाममात्र के लिए अंग्रेजों का राज है। आज राजनीति के सारे लगाम हिन्दुओं के ही हाथ आए हैं। इसीलिए अबके बाद हमें अपने बचाव की संगठित कोशिश करनी होगी। उसके बगैर अबके बाद कोई चारा नहीं। जिस काउंसिल के जरिए राजनीतिक सत्ता को सौंपा जाता है उस काऊंसिल में आपके प्रतिनिधियों का पहुंचना जरूरी है। हिन्दुस्तान में सब दूर काँग्रेस की जो जीत हुई है वह काँग्रेस की नहीं ब्राह्मण्य की जीत हुई है यह हमें भूलना नहीं चाहिए। 5-6 प्रांतों के मुख्यमंत्रियों के पद ब्राह्मणों को ही मिले हैं। मुंबई प्रांत की 11 जगहों में से 5 जगहों ब्राह्मणों को ही मिली हैं। 1919 से 1935 तक काऊंसिल में ब्राह्मण सदस्यों की संख्या बेहद कम यानी 10-12 तक ही सीमित थी। आगे वह और कम होती गई। लेकिन आज मुंबई में काँग्रेस को मुंबई में 27 सीटें मिली हैं। इसी से आपको पता चलेगा कि ब्राह्मण्य की कितनी बड़ी विजय हुई है। इस ब्राह्मण्य से अगर आपको अपना बचाव करना हो तो आपको संगठित होना पड़ेगा।
पिछले राऊंड टेबल कॉन्फरेंस के समय मुझसे एक भूल हुई थी। मुझे कानून में ही यह प्रावधान रखवा लेना चाहिए था कि गवर्नर को मंत्रीमंडल में अल्पसंख्यक पक्ष का एक प्रतिनिधि नियुक्त करना होगा। यह बात इन लोगों की मर्जी पर नहीं छोड़नी चाहिए थी। लेकिन तब मैंने सोचा कि ’लिहाज पकाने वाली के साथखाने वाली को भी करना चाहिए’ उक्ति के अनुसार इस बात पर ज्यादा जोर नहीं दिया। लेकिन उनकी मर्जी पर बात को छोड़ा तो देखिए उसका क्या असर हुआ है। उन्होंने अस्पृश्यों के एक प्रतिनिधि तक को मंत्रीमंडल में जगह नहीं दी। कानून इस बारे में भले न हो, लेकिन शिष्टाचार के तौर पर ही सही उन्हें हमारे एक प्रतिनिधि को लेना चाहिए था। हमारी 15 जगहों में से चार जगहों पर काँग्रेस ने अपनी तरफ से हमारे लोगों को जिताया। फिर उन्हें काँग्रेस ने मंत्रीपद क्यों नहीं दिया? अगर वे चारों प्रतिनिधि आयोग्य हैं तो इन आयोग्य प्रतिनिधियों को चुनाव में जिता कर काँग्रेस ने बड़ी गलती नहीं की? मुसलमानों का प्रतिनिधि लेने में अगर उन्होंने इतनी कोशिशें कीं तो अस्पृश्यों के प्रतिनिधि को क्यों नहीं लिया? इसके लिए एक ही बात जिम्मेदार है और वह, यह कि, उनकी यही मानसिकता है कि, ‘‘हम आपके लिए सब करेंगे, आपको अपने लिए कुछ नहीं करना है।’’
कुछ दिनों पहले चमारों के एक नेता ने अखबार में अपना बयाना छपवा लिया था जिसमें उसने कहा था, ‘‘अस्पृश्यों के प्रतिनिधि को मंत्रीमंडल में नहीं लिया इसका हमें बुरा नहीं लगता क्योंकिखेर साहब पर हमें पूरा भरोसा है।’’ अगर ऐसा ही है तो इन