105 23.8.1937 प्रांत मंत्रीमंडल प्रांत की बुद्धि का अलौकिक भंडार हो - मुंबई - Page 61

40 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

प्रांत का मंत्रीमंडल प्रांत की बुद्धि का अलौकिक भंडार होना चाहिए। इस बिल में जितनी तनख्वाह का जिक्र किया है उतनी तनख्वाह पर राजनीति में पैदा होने वाली कठिन मुश्किलों का सामना कर उन्हें हल करने की कोशिश करने वाले लायक लोग इस काम को करने के लिए आगे आएंगे ऐसा मुझे नहीं लगता। क्योंकि अन्य जगहों पर उन्हें इससे बड़े प्रलोभन दिखाई देंगे। दूसरी बात यह है कि हमारे यहां पढ़े-लिखे लोगों की संख्या बहुत कम है। यहां की सामाजिक व्यवस्था के कारण शिक्षा का लाभ यहां हमेशा एक छोटे तबके को ही मिलता आया है। अंग्रेज सरकार भी इस समाज व्यवस्था को उखाड़ नहीं पाई। चातुर्वर्ण्य में भी शिक्षा का हक केवल एक वर्ग को ही दिया गया है। जनतंत्र पर उसका कैसे असर होता है देखिए- जिन लोगों के पास पैसा है वे अपने निजी या अन्य उद्देश्यों को पूरा करने के लिए राजनीतिक सत्ता हासिल कर सकते हैं। या फिर, जिन्हें और कहीं कुछ करना संभव नहीं हो वे लोग राजनीति में प्रवेश करेंगे। मेरा बस यह कहना है कि मंत्रियों की तनख्वाह उन्हें मोह से दूर रखने लायक जरूर होनी चाहिए। मंत्रियों की तनख्वाह जब 4000 रु. और 3000 रु. थी तब भी हमारे प्रांत का नाम कई बुरी बातों के लिए लिया जाता था। फिर अब जब मंत्रियों की पगार 500 रु. होगी तब ऐसे बुरे उदाहरणों की संख्या क्या नहीं बढ़ेगी? असल मुद्दा यह है कि तनख्वाह का अगर यह स्तर रहा तो क्या राज्य का कामकाज सुरक्षित रहेगा? कॉट्रक्ट भी हम हमेशा सबसे कम रकम वाले मंजूर नहीं करते। कोई अगर कम तनख्वाह लेने के लिए तैयार हो तब भी यह वजह कम तनख्वाह देने के लिए काफी नहीं है। बचत अगर करनी है तो वह भी सोच-विचार के साथ ही करनी चाहिए। कम तनख्वाह रखने के पीछे एक और दलीत दी जा रही है कि यह हमारे राष्ट्रीय जीवनस्तर से मिलता है। ‘हरिजन’ में विभिन्न देशों के आम लोगों की आय के जो आंकड़े दिए गए हैं उसमें आम हिन्दी व्यक्ति की आय 4 पौंड बताई गई है। सो इस हिसाब से मंत्री की तनख्वाह 75 रु. हर माह होनी चाहिए। उस हिसाब से देखें तो 500 रु. की तनख्वाह बहुत बड़ी फिजूलखर्ची ही साबित होगी। फिर ईमानदारी से केवल 75 रु. की तनख्वाह ही क्यों नहीं लेते? मेरा कहना यह है कि इससे जनता के मन में आपके बारे में विश्वास पैदा नहीं होगा। वदन को उघाडे घूम कर सिगरेट की जगह बीड़ी फूंक कर, बैलगाडि़यों से यात्रा कर या रेल के तीसरे दर्जे से यात्रा कर लोगों की आंखों में धूल क्यों झोंकनी है? विलायत के मध्ययुगीन भिक्षु ब्रह्मचर्य, शुचिर्भोत्य और दरिद्रता में अपना जीवन बिताने की प्रतीज्ञा किया करते थे। हमारे मंत्रियों के साथ ब्रह्मचर्य कोई समस्या नहीं रही है, अब यह समस्या उनके बस से बाहर हो गई है। शुचिर्भोत्य की प्रतिज्ञा को अगर वे तोड़ते हैं तो उस बारे में इस सभाग्रह को शिकायत करने की कोई वजह नहीं माननी चाहिए। दरिद्रता के बारे में कहना हो तो वे भिक्षु अकेले होते थे इसलिए उन्हें इससे कोई फर्क नहीं पड़ता था। लेकिन आजकल के युग में मंत्रियों का दरिद्रता में जीवन बिताना क्या ठीक होगा? मेरा