43
मैं इस सभा में आने वाला नहीं था। लेकिन फिर मुझे पता चला कि यहां पुरानी पद्धति से चिपके रहने वाले कुछ लोग हैं। वे महार परिषद द्वारा पारित किए गए धर्मांतरण के प्रस्ताव को पूरी तरह से अमल में नहीं लाते। ऐसे लोगों के मन में उठने वाली आशंकाओं को दूर करने के लिए मैं यहां आया हूं। अपनी राय मैंने इससे पहले भी कई बार सुनाई है। उसे लेकर आपके मन में कोई शक नहीं होना चाहिए। 1935 में हुई मुंबई इलाका महार परिषद असल में महार जाति के इतिहास में स्वर्णाक्षरों से लिख रखने जैसे हुई है। यह परिषद अपूर्व, प्रचंड और पूरी तरह से प्रतिनिधिक बनी है। सो ऐसी परिषद द्वारा पारित किए गए प्रस्ताव असल में पूरी महार जाति को मानने चाहिए। महार जाति वे बहुसंख्य लोग उन्हें मानते भी हैं। हालांकि महार जाति के बहुत कम लोग हैं जो अभी भी पुरानी परंपरा से चिपके हुए हैं ऐसा मैंने सुना है। ऐसे लोगों से मैं यह कहना चाहता हूं कि अल्पमत के लोगों को हमेशा बहुमत के लोगों के अनुसार चलना पड़ता है। आज की काउंसिल का ही उदाहरण लीजिए। आज काउंसिल में काँग्रेस का बहुमत है सो जो कानून वे बनाते हैं उन्हें हमें मान्यता देनी ही पड़ती हैं। जाति के लिए मिट्टीखानी पड़ती है, ऐसी एक कहावत है। सो जाति अगर धर्मांतरण का निर्णय लेती है तो उसे मानना क्या हमारा कर्त्तव्य नहीं है?
कई कामों के लिए हमें जाति के पास ही जाना पड़ता है। सो जाति अगर कोई प्रस्ताव बनाती है तो उसे हम क्यों ना मानें? हिन्दु धर्म के अनुसार हम जिन धार्मिक तीन त्यौहारां को मानते थे उन्हें मनाना हमें बंद कर देना चाहिए। आज इन्हें छोड़ देने का कारण मैं बताने जा रहा हूं वह थोड़ा अलग है। हिन्दु धर्म के अनुसार जो विधि किए जाते हैं वे धर्म ही नहीं नीति के नजरिए से भी सही होते हैं। क्या इस पर भी हमें सोचना चाहिए। कुछ विधियां बिलकुल अजलूल होती हैं उदा लोग शंकर भगवान के नाम से सोमवार का व्रत रखते हैं और शंकर की पिंडी की कई तरीकों से पूजा करते हैं। लेकिन क्या कभी किसीने यह सोचा है कि असल में शंकर की पिंडी है क्या? वह और कुछ नहीं पुरुष-स्त्रि की संभोग क्रिया की प्रतिमा है। ऐसी वीभत्स प्रतिमा की हम महिमा क्यों गाएं? सड़कों पर कुत्तों की तरह अगर नर-नारी वाहियात हरकतें करने लगें तो हम उनकी फूलों से पूजा करें या कि जूते से? तो फिर पार्वती-शंकर की इसी क्रिया की प्रतिमा यानी भगवान की वीभत्सता की क्या हमें पूजा करी चाहिए? गणपति के साथ भी यह बात है। गणपति की कथा यह है कि एक बार पार्वती नहा रही थी। तब शंकर कहीं और गया था। तब नहाते समय कोई व्यवधान ना आए इसलिए पार्वती ने अपने बदन का मैल उतार कर उससे रक्षणकर्त्ता गणपति को बनाया। सौ, मैल से उत्पन्न अमंगल को भगवान कैसे माना जाए? लेकिन हिन्दू धर्म के भगवान बड़े विचित्र हैं। इसीलिए ईमानदारी से मुझे लगता है कि उनकी पूजा नहीं की जानी चाहिए।