107 6.11.1937 कानून ऐसे बनवा लें कि बहुजन समाज के साथ अन्याय न हो - मसूर (सातारा) - Page 67

46 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

उस काम पर मेरे पिता कैशियर के पद पर काम कर रहे थे। मैं, मेरे दो भाई और मेरी बहन का बेटा हम चार लोग पढ़ाई के सिलसिले में सातारा में रह रहे थे। तब मेरी मां गुजर गई थी। हम सबका पिताजी के एक परिचित जो हमारे पड़ोस में रहते थे, ध्यान रखा करते थे। गर्मी की छुट्टियों में पिताजी ने हमें गोरेगांव बुलाया। हमारे आने की

खबर देने वालाखत पहले हमने एक हमाल के हाथों भेजा था। रेल से वहां पहुंचने में हमें बड़ा मजा आया। क्योंकि उससे पहले इंजन के सहारे यह गाड़ी कैसे चलती है यह हमने नहीं देखा था। सो हमने बड़ी आतुरता से यात्रा की। यात्रा के लिए नए कपड़े, जर वाली टोपियां आदिखरीद कर हम सातारा से पाडली स्टेशन पर गाडी में बैठ गए। वहां से मसूर तक की यात्रा बड़े मजे में बीती। मसूर पहुंचे तो यह देखकर अजरज हुआ कि कोई हमें लेने नहीं आया था। दोपहर 4 बजे से रात 7 बजने तक हम मसूर स्टेशन पर बैठे रहे। हमें इस प्रकार बैठा देख कर स्टेशन मास्टर ने हमसे पूछ-ताछ की। हमने अपनी जाति बताई तो वह जैसे बिदक गए। आखिर बड़ी मुश्किल से उनहोंने गोरेगांव पहुंचने के लिए हमारे लिए गाड़ी का प्रवेश करवा दिया। लेकिन गाड़ीवान को हमारी जात बताते हुए वह भी चमक गया। महारों के बच्चे हैं सोच कर वह हमें ले जाने के लिए अनाकानी करने लगा। आखिर हमारे भाई ने एक रास्ता निकाला। हम गाड़ीखुद चलाएंगे और गाड़ीवान साथ चलेग। साथ ही गाड़ीवान को तय किराए से एक रुपया अतिरिक्त देंगे। इस प्रकार बातें तय होने के बाद गाड़ीवान ने गाड़ी में बैल जोड़े। और हम गाड़ी चलाने लगे। आगे मसूर गांव के नाले के पास गाड़ी रोकी। हमें बहुत प्यास लगी थी। कहां का पानी पिएं यह जब हमने गाड़ीवाले से पूछा तो उसने गोबर से भरे एक गड्ढे की ओर इशारा किया। वहां का दुर्गंधयुक्त पानी पीना असंभव था। हमें प्यास बहुत लगी थी, लेकिन गंदे पानी के कारण हमें प्यासा ही रहना पड़ा था। हम आगे बढ़े। रात हो चुकी थी। प्यास और भूख से हम परेशान थे। स्पृश्यों के नालों पर पानी पीना या पानी मांगना हमारे लिए मना था। मध्यरात्रि के आस-पास हम टोल नाके पर पहुंचे। वहां भी महार जाति के हैं इसलिए पानी नहीं मिला। आखिर ऐसी ही तड़पती हालत में हम गोरेगांव पहुंचे। पिताजी ने हमसे पूछा कि इस तरह बिना पूछे क्यों आए? उससे पता चलता कि हमारा भेजाखत उन तक पहुंचा नहीं था। हमारी हालत देखकर उनका दिल हलक में आया। इस यात्रा से हमें जीवन में पहली बार पता चला कि हम ‘अस्पृश्य’ हैं, हमें कम, निम्न माना जाता है, हमारे पनघट गलिच्छ जगहों पर होते हैं, स्पृश्य लोग हमसे छुआछूत मानते हैं। मेरे बाता मन पर इस घटना ने गहरा असर डाला। आज हजारों लोगों के सामने यह घटना बतानी पड़ेगी यह तो हमने सोचा भी नहीं था।खैर सो!

आज हम सब यहां स्वतंत्र लेबर पार्टी की स्थापना करने आएं है। हमारी पार्टी के कार्यक्रम की जानकारी आप सभी को है। हिन्दुस्तान पर लदे नए सुधारों में बहुतखामियां