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हैं इसलिए एक जिम्मेदार स्वराज देने में वह असमर्थ है। प्रांतीय प्रशासन की कई घटनाएं
खासकर सेकेंड चेंबर की घटना हमारी पार्टी को आपत्तिजनक लगती है। हालांकि इन नए सुधारों पर अमल करने में कोई हर्ज नहीं है। हालांकि जिम्मेदार स्वराज का स्वरूप निष्प्रभावी करने वाले जो विशेष और अनियंत्रित अधिकार गवर्नर को मिले हैं उनका इस्तेमाल इस दरमियान न किया जाए इस बारे में स्वतंत्र लेबर पार्टी जागरूक रहेगी। इसी प्रकार हमारे पक्ष का संकल्प है कि अस्पृश्य बंधु, मजदूर और किसानों के बीच रिश्ते कैसे ठीक किए जा सकते हैं इस बारे में सोचते हुए मेहनतकश लोगों के लिए विधायक कार्य किए जाएं। आप जातने हैं कि मिलों में काम करने वाले मजदूरों के बीच स्पृश्य और अस्पृश्य का स्पष्ट भेदभाव है। स्पृश मजदूर को कपड़ा विभाग में काम मिलता है और वह जॉबर का पद पाने तक उन्नति कर सकता है लेकिन भले लायक हो लेकिन अस्पृश्य मजदूर को कपड़ा विभाग में काम नहीं मिलता। वह तेल वाले काम तक ही सीमित रहता है। मजदूरों की हालत कष्टों से भरी और बुरे हाल है स्पृश्य मजदूरों की दरिद्रता मालिकों के कारण बनी है लेकिन अस्पृश्य मजदूरों की दरिद्रता के लिए मालिक के साथ-साथ उनकी अस्पृश्यता भी जिम्मेदार है। दुख की बात यह है कि कांग्रेस और गैर-काँग्रेसी नेता इस बात को जान-बूझकर नजरंदाज करते आए हैं। स्वतंत्र लेबर पार्टी के खिलाफ वातावरण बनाने की कोशिश के पीछे जो कई कारण हैं उनमें से ये भी एक कारण है। काँग्रेस या अन्य पार्टियों के मजदूर नेता आज इस बात की कोशिश नहीं कर पाते कि जाति या वर्ग भेद के कारण उनकी काबिलियत पर कोई आंच आए उनकी उन्नति का मार्ग अवरूद्ध न हो। क्योंकि काँग्रेस के नेता आज पूंजीपतियों के चंगुल में फंसे होने के कारण उनसे गरीब किसानों और मजदूरों का भला नहीं हो सकता। काँग्रेस घोषणा करती है कि वह पूंजीपतियों का कल्याण करेगी और गरिबों का भी कल्याण करेगी। एक मियान में दो तलवारें नहीं रह सकतीं। ऐसी हालत में मेहनत करने लोग काँग्रेस के भरोसे नहीं रह सकते। कांग्रेस के पंचप्राण महात्मा गांधी के मन में क्या है यह मैं जानता हूं। जितना उनके मंसूबों के बारे में मैं जानता हूं उतना आप नहीं जानते। मेरा और उनका जितना परिचय है उसके आधार पर कहता हूं कि महात्माजी आपका कल्याण नहीं कर सकते। इस बारे में उनकी और हमारी राहें बिल्कुल अलग हैं। जिसे रोटी चाहिए उसे मंदिर देकर क्या फायदा? पिछली गोलमेज परिषद में अस्पृश्यों को लेकर बड़ा मसला हुआ था। ब्यूरोक्रसी से सत्ता लेकर उसे बहुजन समाज को सौंपते हुए उसका कुछ अस्पृश्यों को दें ऐसा सभी का कहना था। लेकिन तब ये महात्मा अस्पृश्यों के हकों के खिलाफ गए। हालांकि मुसलमानों, ईसाई आदि अल्पसंख्यकों को वह सत्ता का कुछ हिस्सा देने के लिए तैयार थे। ऐसे कठिन हालात में हिन्दुओं के इस महान नेता के साथ अपने अलग हकों के लिए हमें लड़ना पड़ा। अस्पृश्यों के कल्याणकर्त्ता