107 6.11.1937 कानून ऐसे बनवा लें कि बहुजन समाज के साथ अन्याय न हो - मसूर (सातारा) - Page 69

48 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

कहलाने वाले हिन्दुस्तान के इस महात्मा को हमारे खिलाफ नहीं जाना चाहिए था। वे अगर हमारे असली कल्याणकर्त्ता होते तो उनसे विवाद करने में मुझे अपनी शक्ति नहीं

खर्चनी पड़ती।

स्वराज के लिए महात्माजी को तुरंत एक करोड़ रुपये देने वाले स्पृश्य लोग अस्पृश्यता निवारण के लिए पांच-छह लाख का चंदा क्यों नहीं दे सकते? इसी बात से पता चलता है कि स्पृश्य समाज को अस्पृश्यता नष् करने में रत्ती भर भी दिलचस्पी नहीं है। जब­ रदस्ती का ओढा यह गांधी जी का आन्दोलन हमारी उन्नति कैसे हासिल करेगी? आपकी अस्पृश्यता, आप पर होने वाले जोर-जुल्म, आपके होने वाले सामाजिक कष्, आपकी मान, हानि, दरिद्रता ये लोग कैसे नष् करने वाले हैं? सच पूछो तो स्पृश्य हिन्दू दिखाऊ काम करने में बड़े माहिर हैं। वे बड़ी शिद्दत से अंदर ही अंदर आपके जीवन में कांटे बोने की कोशिशों में लगे रहते हैं। अमीर, साहूकार, जमींदार, पूंजीपति आपका आर्थिक जीवन कष्टमय बना रहे हैं। तो दूसरी तरफ बहुजन समाज का प्रतिनिधित्व करने वाली कांग्रेस सीना ठोक कर अपने को स्पृश्यों, गरीबों, दीन-हीन-पीडि़तों की कल्याणकारी बता रही है। इन सब बातों पर गौर करने के बाद लगता है कि अगर काँग्रेस हमारा कल्याण करने वाली संस्था होती तो मैं बड़ीखुशी के साथ उसमें शामिल होता। लेकिन मुझे नहीं लगता कि काँग्रेस हमारे समाज का, मजदूरों का या किसानों और गरीबों का कल्याण करेगी इसीलिए मैंने स्वतंत्र लेबर पार्टी की स्थापना की है।

अंग्रेज हो सकता है इस देश से चले जाएं लेकिन गरीब जनता को ठग कर उसका

खून चूसने वाला धनवान पूंजीपतियों का जो वर्ग है वह कभी नहीं जाएगा। वह काँग्रेस में शामिल हो गया है। काँग्रेस में शामिल होने से उसकीखून चूसने वाली मानसिकता बदले वाली नहीं। अंट-शंट ब्याज लेने की उनकी पैशाचिक वासना नष्ट नहीं होने वाली। गरीबों के घरों पर हल चलाने वाली उनकी बुद्धि नष् नहीं होने वाली।

लगता था कि मुंबई इलाके के गैर-ब्राह्मण पक्ष गरीबों के लिए कुछ काम करेंगे। कुछ समय तक यह सोच कर गर्व भी महसूस होता रहा। लेकिन आखिर अनुशासन और संगठन के अभाव में तथा बहती गंगा में हाथ धो लेने, अपना उल्लू सीधा करने की मानसिकता के कारण इस पार्टी की सारी ताकतखत्म हो गई है। श्रेष्ठ कहलाने वाले ब्राह्मण समाज की मगरूर नीति को नेस्तानाबूत करने का उनका इरादा कहीं का कहीं मिट गया। एक ताकतवर पार्टी का आज का यह हाल गौर करने लायक है। इसलिए हम में से हर किसी को अपनी पार्टी के साथ पूरी ईमानदारी बरतनी चाहिए। अपने नेता की आज्ञा को सिर-आंखों पर रखना चाहिए। पार्टी के कार्यक्रम में विश्वास रखते हुए बिना दगलबाजी के उस पर अमल करने की पुरजोर कोशिश करनी चाहिए। अपना स्वार्थ त्याग देना चाहिए। अपने पक्ष के लिए कुछ मुश्किलें उठानी पड़ें तो उठानी चाहिए। अनुशासन