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* नेताओं की मृत्यु के बाद भी समाजकार्य निरंतर चिरकाल तक
चलता रहे
13 नवम्बर, 1937 को ‘जनता’ में दी गई सूचना के अनुसार शनिवार दिनांक 20 नवम्बर, 1937 के दिन रात 8 बजे वडाला, मुम्बई में एक कार्यक्रम आयोजित किया गया था जिसमें श्री भाऊराव गायकवाड को मानपत्र देकर सम्मानित किया जाने वाला था। इस कार्यक्रम की अध्यक्षता डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर ने की थी। इस अवसर पर श्री शंकरराव वडवलकर ने श्री भाऊसाहब गायकवाड के कार्य का संक्षिप्त सिंहावलोकन प्रस्तुत किया। उसके बाद श्री भाऊसाहब गायकवाड ने मानपत्र का जवाब देते हुए भाषण किया।
उनके भाषण के बाद मानपत्र अर्पण समारोह के अध्यक्ष डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर का भाषण हुआ। उन्होंने भाषण में कहा,
‘‘आज के इस अवसर पर उपस्थित रह पाया इसलिए मैं अपने आप को धन्य मानता हूं। इसीलिए इस सामारोह का आयोजन करने के लिए यहां के चालक सदस्यों को मैं धन्यवाद देता हूं। अक्सर आंदोलनों की लो चमकाने के लिए जिन कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है वह उस तरह का कार्यक्रम नहीं है। एक सम्मानीय व्यक्ति का अभिनंदन करने के लिए इस सभा का आयोजन किया गया है और इसका महत्व भी उतना ही बड़ा है। श्री भाऊसाहब कितने बड़े हैं यह अलग से बताने की जरूरत नहीं है। आज के मानपत्र की भाषा उन्हें अत्युक्ति भरी लगती है लेकिन मेरी राय में वह अत्युक्ति भरी नहीं है। भाऊराव का योगदान अनमोल है। मुझे इस वक्त इस बात का बुरा लग रहा है कि मानपत्र अर्पण का यह समारोह वडाला के निवासियों की ओर से न होकर कुछ अन्य लोगों की ओर से आयोजित किया जा रहा है। दूसरी बात यह कि, यह समारोह पूरे मुम्बई इलाके की ओर से कम से कम मुम्बई शहर की ओर से आयोजित किया जाना चाहिए था। जो हो, यह कार्यक्रम होना जरूरी था और मैं अध्यक्ष पद स्वीकारने की विनीति को मना नहीं कर सका। पिछले दस वर्षों में हमारे समाज की जो उन्नति हुई है उसके बारे में मैं जब शांतिपूर्वक सोचता हूं तब मेरे मन में बार-बार दो विचार गूंजते रहते हैं- गांधी जी जैसे पुरुष के साथ झगड़ने में सफलता पाकर हमें राजनीतिक अधिकार प्राप्त हुए और हमें राजनीति में समानता का दर्जा मिला। ब्राह्मणों, क्षत्रियों के
* जनताः 27 नवम्बर, 1937