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फटने के आसपास पंढरपुर की राह पर चलीं। रास्ते में माढे तालुका के वातले गांव में गांववालों की ओर से डॉ. बाबासाहेब को और अन्य विधायकों को फूलमालाएं पहनाई गईं। आगे कर्कम गांव के पास गाडी आते ही गांव का अस्पृश्य समाज और स्वयंसेवक दल बाजे-गाजे के साथ डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर के स्वागत के लिए उपस्थित हुए। सभी लोगों का वहां एक छोटा जुलूस ही बना। गांव में मातंग और महार समाज ने बाबासाहेब के स्वागत की तैयारी में मंडप बनाया था। कर्कम गांव से जुलूस निकल कर डॉ. साहब की मोटर और स्वयंसेवकों वाली बस बादलकोट फॉरेस्ट से बहती चंद्रभागा नदी के तीर वाली परती जमीनें देखने चले। गाड़ी में विधायक गायकवाड, ऐदाले, रोहम, सावंत और चित्रे आदि लोग थे। यह परती जमीन अस्पृश्य लोगों को रियायती दामों में मिले इसलिए विधायक ऐदाले सरकार में कोशिश कर रहे हैं। डॉ. बाबासाहेब प्रत्यक्ष रूप से जमीन देखें इसलिए श्री ऐदाले ने यह कार्यक्रम रखा था। परती जमीन तक पहुंचने के लिए 3 किमी. तक की पैदल यात्रा करनी पड़ती थी। बाबासाहेब ने पैदल 3 किमी चल कर उस जगह को देखा। नदी के किनारे गांव वालों द्वारा लाया गया अल्पाहार ग्रहण किया और वह कर्कम गांव लौट आए। वहां महार समाज की ओर सेखास तौर पर बनाए गए मंडप में उनका प्रेमपूर्वक स्वागत किया गया। उनसे दो शब्द कहने की विनति की गई। मातंग समाज द्वारा स्वागत के लिए जो मंडप बनाया है वहीं दो शब्द कहने की बात बता कर उन्होंने विधायक गायकवाड को दो शब्द बोलने की आज्ञा दी। तब भाऊसाहब गायकवाड ने संक्षेप में लेकिन समयोचित भाषण किया। उनके भाषण के बाद डॉ. बाबासाहेब ने वहां उपस्थित महिला एवं पुरुषों से स्वतंत्र लेबर पार्टी के सदस्य बनने के लिए कहा और उसके बाद वहां का कार्यक्रम समाप्त हुआ। उसके बाद सब लोग मातंग समाज द्वारा बनाए गए मंडप में चले गए। वहां महार एवं मातंग समाज द्वारा बनाए गए शामियाने में दाखिल हुए। वहां महार और मातंग समुदायों के लोग बड़ी संख्या में जुटे हुए थे।
वहां छोटा-सा भाषण देते हुए डॉ. बाबासाहेब ने कहा-
कल, यानी 1 जनवरी, 1938 को सोलापुर में मातंग समाज की एक परिषद होने वाली है। उस परिषद में मुझे आमंत्रित किया गया है। वहां मैं जिस विषय पर विस्तार से बोलने वाला हूं उसी विषय पर आज यहां मैं संक्षेप में बोलूंगा। यहां बोलने का उद्देश्य यह है कि आप में जैसे कुछ लोग उस परिषद में जाने वाले होंगे और कुछ लोग किन्हीं कारणवश वहां न जाने वाले भी होंगे। जो नहीं जाने वाले हैं उन्हें वहां किए जाने वाले भाषण का सार संक्षेप पता चले इसलिए आज मैं यहां अपनी बात बताने जा रहा हूं। पहली बात यह कि अस्पृश्यों में शामिल महार, चमार, भंगी आदि जो जातियां हैं उनमें एकता नहीं है यह हम सभी का दुर्भाग्य है। इस एक न होने का कारण हिन्दु समाज का जाति भेद ही है। जाति भेद के लिए महार, चमार, भंगी या मांग जिम्मेदार नहीं हैं। जातिभेद ऊपर से बह कर आई गटर गंगा है। हमारी तरफ बह कर आता नरक है। इसी कारण जाति भेद