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* जुल्म ढाने वालों का मुकाबला करने के लिए तैयार रहें
31 दिसम्बर, 1937 को कर्कम से पंढरपुर की ओर जाते हुए मोटरगाड़ी में विधायक विभिन्न विषयों पर अपने अलौकिक नेता के विचारों की अमृतधारा का पान कर रहे थे। थोड़ी ही देर में यानी दोपहर 12 बजे के आसपास चंद्रभागा नदी के इस पार गाड़ी पहुंची। यहां महिलाएं और पुरुषों का अपार समुदाय इस मृत समाज में संजीवनी निर्माण करने वाले लोकोत्तर पुरुष का दर्शन करने के लिए पहुंचे थे। गाड़ी नजर आते ही जयकार की ध्वनि से वातावरण गूंजने लगा। दर्शनोत्सुक लोगों के झुंड दौड़ते हुए गाड़ी के आगे आने लगे। चंद्रभागा पर बने पुल के मुंहाने जब गाड़ी आई तब भीड़ इतनी उमड़ पड़ी थी कि गाड़ी को आगे निकलने के लिए रास्ता ही नहीं मिल रहा था।
संपादक महाराज, आपका संवाददाता कोई पंढरपुर का वारकरी नहीं है। वह पहली बार पंढरपुर आया है। हालांकि ‘पंढरपुर महिमा’ उसने सुन रखी है। उसने सुना था कि बिठोबा के दर्शन के लिए अनगिनत लोग पंढरपुर में प्रवेश करते हैं। लेकिन उसने यह नहीं सुना था कि किसी विभूति के दर्शनों के लिए पंढरपुर की जनता विट्ठत को भुला कर चंद्रभागा को लांघ कर पंढरपुर से बाहर भी निकलती है। एक समाज बिट्ठल के दर्शनों के लिए पंढरपुर में प्रवेश करता है तो दूसरा समाज विटठ्ल की महति पर आघात करने वाली विभूति के दर्शनों के लिए पंढरपुर से बाहर निकलता है। इस दृश्य के ही कारण आपके संवाददाता के मन में ख्याल आया कि धार्मिक भावनाओं से अंधा हुआ बहुजन समाज अपनी आंखों पर लगी काली पट्टीखोल कर हिंदमाता का भविष्य उज्ज्वल करेगा। जो हो, इस दृश्य से इतना भर साफ-साफ नजर आ रहा था कि स्पृश्य समाज जिस मार्ग पर चला जा रहा है उसकी ठीक विपरीत दिशा में अस्पृश्य माने गए समाज का आज का मार्ग है।
गाड़ी का आगे का रास्ता वर्दीधारी समता सैनिक दल की स्थानीय टुकडि़यों ने बनाया और गाडी पुल से आगे बढ़ने लगी। गाड़ी के दोनों तरफ लोगों की भीड़ थी। आगे स्वयंसेवक थे, पीछे अपार भीड़ इस प्रकार जुलूस आगे बढ़ने लगा। गाड़ी बेहद धीमे चल रही थी। इसमें तय समय पर अगले कार्यक्रम कर पाना मुश्किल हुआ। गाड़ी तेजी से चलती तो लोग भी साथ में दौड़ने लगते। इसी प्रकार चलते हुए जुलूस एक मोड़ पर आया। जुलूस से निकले बगैर आगे बढ़ना संभव नहीं था इसलिए गाड़ी को
* जनताः 8 और 15 जनवरी, 1938