63
पता लगा पाना मुश्किल था। तब लोग जाकर नामदेव से मिले। इस मामले में कोई उपाय सुझाने के लिए कहा। नामदेव ने कहा कि कई हड्डियों में से चोखोबा की हड्डियां ढूंढना मुश्किल काम नहीं है। क्योंकि चोखोबा की हड्डियां विट्ठल का नाम पुकार रही होंगी। इसीलिए जिन हड्डियों से ‘विट्ठल-विट्ठल’ की ध्वनि निकले वे चोखोबा की हड्डियां हैं ऐसा समझ कर उठा लें और उन पर समाधि बनाएं। अब हड्डियों से ध्वनि निकलने की बात को अगर हम छोड़ भी दें तो भी यह निर्विवाद रूप से कह सकते हैं कि उसकी बेजान हड्डियों से भी विट्ठल का नाम गूंजे इतनी उनकी महती थी। ज्ञानदेव, सोपानदेव, मुक्ताबाई आदि संतों की मालिका में चोखोबा को स्थान प्राप्त हुआ। लेकिन वह विट्ठल के मंदिर में प्रवेश नहीं कर पाए। उनकी समाधि भी मंदिर से दूर बनाई गई है। जिस वर्ग में चोखोबा का जन्म हुआ था इस वर्ग के साथ उनके जमाने में जैसा व्यवहार किया था ठीक उसी हीन प्रकार का व्यवहार आज भी उस वर्ग के साथ होता है। उसी नजरिए से आज भी हमें आंका जाता है। इसीलिए, मैं कहता हूं, क्यों हम उस धर्म से आस लगाएं जिस धर्म से चोखोबा ने आस लगाई थी और उपेक्षा के अलावा कुछ नहीं पाया था। उस धर्म में हमेशा ही हमें हीन माना जाएगा। इसीलिए हमें ऐसे धर्म से दूर ही रहना होगा।
दूसरा मसला आर्थिक है यानी हमारे पेट पालने का मसला है। आज देश की सारी संपत्ति पर सफेदपोश वर्ग ने कब्जा कर रखा है। वह बड़े ठाठ से, ऐसोआराम में जी रहा है। और आपके पास भरपेटखाना नहीं है, शरीर ढकने के लिए वस्त्र नहीं। अभी एक औरत अपने बच्चे के लिए कपड़ेखरीदने के लिए मुझसे दो आने मांग रही थी। उस महिला का जो हाल है वही हम सबका हाल है। इसका कारण - उनके हिस्से संपत्ति आई है और हमारे हिस्से दरिद्रता। संपत्ति का न्यायपूर्ण बंटवारा नहीं हुआ। यह बंटवारा समान कैसे बनाया जाए यही आज का सवाल है। गांव के पास वाली परती जमीन हम लोगों को कसने के लिए चाहिए यह अपनी मांग हम सरकार के सामने रखते हैं तो उनकी यह दलील होती है कि वह जमीन उनके मवेशियों के चारे के लिए उन्हें चाहिए। इसलिए हमें ना दी जाए। उनकी ऐसी कोशिशों के कारण वे परती जमीनें भी हमें मिल नहीं पाती। मुख्यमंत्री सम्माननीयखेर से जब मेरी मुलाकात हुई थी तब मैंने उनसे पूछा कि गांववालों के मवेशियों से भी क्या हमारी जानें कम कीमत की हैं? सरकार क्या हम लोगों की ओर ध्यान देने के बजाय गांव के मवेशियों केखाने-पीने का प्रबंध करेगी? सरकार को पहले इंसानों की जान बचानी चाहिए। आपको बस इतना ही बताना चाहता हूं कि आपकी कीमत आज जानवरों से भी कम है। आज सब लोग सेठ-साहूकारों की मदद करते हैं। गरीबों का मसीहा कोई नहीं है। गरीब ही गरीब का मसीहा है। गरीबों