66 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
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* राजनीति की गाडीखींचते हुए ध्यान रखें कि उसका पहिया
आपको कुचल न दे
नए वर्ष के पहले दिन यानी 1 जनवरी, 1938 के दिन सोलापुर में ईसाई समाज के लिए डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर के एक भाषण का आयोजन किया गया था। अध्यक्ष थे, रे. गंगाधरराव जाधव। कार्यक्रम का आयोजन रा. ऐदाले, एमएलए की सहायता से रा. बलवंतराव गायकवाड, रा. समभाऊ पाटोले और र. बी. चिंदे ने किया था। शून्य से भी नहीं वरन घटाने के चिर्िं से शुरू कर आज की स्थिति तक वह किस प्रकार आ पहुंचे यह उन्होंने बताया। इसके पीछे केवल यही उद्देश्य था कि अपने समाज की कमजोरी पर होते हुए समय गंवाने के बजाय नए वर्ष का नए निश्चय के साथ प्रगति पथ पर आगे बढ़ते हुए स्वागत करें, प्रगति साध्य करने के लिए कोशिश करें। डॉ. ब ाबासाहेब ने आगे कहा,
हर तरफ अपने धर्मांतरण की छीछालेदर चल रही है। प्रि. अत्रे के ‘वंदे मातरम’ नाटक के एक प्रसंग के सहारे इसका उदाहरण प्रस्तुत किया जा सकता है। इसके बावजूद धर्मांतरण के लक्ष्य से सूत भर भी टालने को तैयार नहीं। वैसे, धर्मांतरण करने वाले का किसी ने गुणगान किया हो, ऐसा कम से कम हिन्दुस्तान में देखने में नहीं आता।
दुनिया के सभी धर्मों का अच्छी तरह से आध्यात्मिक नजरिए से मैंने अध्ययन किया है। इन सभी प्रमुख धर्मों में से केवल दो धर्म और उन दो धर्मों के केवल दो व्यक्ति धर्मांतरण के मेरे मन के आगे हैं। उनमें से पहला व्यक्ति है बुद्ध और दूसरा ईसामसीह। ‘इंसान का इंसान के साथ क्या कर्त्तव्य है, इंसान का भगवान के साथ क्या कर्त्तव्य है, बेटा बाप के साथ कैसे पेश आए, किस धर्म में सभी मानवों के प्रति समता का भाव बताया गया है, सबको समान स्वतंत्रता दी गई - वही धर्म मुझे और मेरे अनुयायियों को चाहिए।’ मिशनरियों को लगता है कि आदमी को ईसाई बनाओ तो काम पूरा हुआ है। उस व्यक्ति के राजनीतिक अधिकारों के बारे में उन्हें कुछ लेना-देना नहीं होता। ईसाई लोगों में मुझे यह एक बहुत बड़ा दोष दिखाई देता है। क्योंकि आज तक उन्होंने राजनीति में प्रवेश नहीं किया है। किसी भी संस्था का राजनीतिक आधार के बिना टिक पाना कठिन होता है। हम भले अस्पृश्य, अनपढ़ और अज्ञानी हैं। फिर भी हम आंदोलन कर रहे हैं। इसी कारण लेजिसलेटिव एसेंब्ली में हमारी पंद्रह जगहें हैं। अस्पृश्य बच्चों
* जनताः 5 फरवरी, 1938