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हॉल के सामने से ले जाते हुए बीच में कहीं भी बिना रोके आजाद मैदान तक ले जाने की सूचना पुलिस ने जुलूस के कार्यकर्त्ताओं को दी थी। इस बारे में किसान-नेताओं में काफी सोच-विचार हुआ और उन्हें पुलिस के निर्देशों का पालन करने की बात माननी ही पड़ी। हालांकि उन्होंने मांग की कि इस जुलूस में से कम से कम बीस प्रतिनिधियों को सम्माननीय मुख्य प्रधान से मिल कर किसानों की बात उन्हें बताने की इजाजत दी जाए। पुलिस कमिशनर ने तुंत उन्हें इस बात की इजाजत दे दी। इस प्रकार मेयो रोड के पास से कूपरेज के पास से, काउंसिल हॉल को घेरा देकर, म्युजियम के पास से 20-25 हजार किसानों का यह जुलूस गगनभेदी घोषणाएं देते हुए एक बार फिर शाम पांच बजे के आसपास आजाद मैदान पहुंची। इस प्रचंड जुलूस का संगठन और व्यवस्था देखकर कोई भी अचंभित ही होता। हमें लगता है कि कानून और व्यवस्था विभाग के अधिकारियों ने मुम्बई की सारी पुलिस इस जुलूस के बंदोबस्त के लिए भेज दिए थे। 1931 में कांग्रेस द्वारा पुकारे गए सविनय अवज्ञा आंदोलन में सरकार द्वारा बिल्कुल इसी प्रकार का बंदोबस्त रखा था। तब काँग्रेस की केसरिया रंग के कपड़े पहनीं देश सेविकाएं पुलिस का बंदोबस्त देखकर ‘हे जुल्मी सरकार नई रखना’ गीत गाया करती थीं। आज उस गीत के सूत्रधार गरीबों की शांति और न्यायपूर्ण मांगों के लिए निकाले गए जुलूस के लिए पुलिस का कड़ा बंदोबस्त करने पर मजबूर हैं यह देखक सोचने-विचारने वाले किसी भी व्यक्ति को अचरज जरूर लगता। किसानों का यह बड़ा जुलूस जब काउंसिता हॉल के आगे से गुजर रहा था तब भी गरीबों की सहायक कहलाने वाली काँग्रेस सरकार ने उनकी ओर सहानुभूति से देखने तक की तकलीफ नहीं की। काँग्रेस के लोगों का यह बर्ताव ही बताता है कि उन्हें किसानों के प्रति कितनी आस्था है।
आखिर यह जुलूस जब एक बार फिर आजाद मैदान पहुंचा तब स्वतंत्र लेबर पार्टी के नेता डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर की अध्यक्षता में सार्वजनिक सभा का आयोजन किया गया। इससे पूर्व सम्मानीयखेर ने किसानों के बीस प्रतिनिधियों से शाम सात बजे मिलने का आश्वासन दिया था। आजाद मैदान पर किसानों की सभा में भाई चित्रे का भाषण हुआ। भाई चित्रे की तरह कॉ. याज्ञिक, द. वि. प्रधान, लालजी पेंडसे, मिरजकर, टिपणीस आदि नेताओं के फड़कते भाषण हुए। उनके भाषणों के बाद डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर का भाषण हुआ।
डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर भाषण देने उठखड़े हुए तो उनके नाम का जयघोष हुआ। अपने भाषण में उन्होंने बड़ी स्पष्टता से बताया-
मेहनत करने वालों का अगर संगठन बनाना हो तो उसमें जाति भेद, धर्म भेद को बिल्कुल जगह नहीं होनी चाहिए। पहले ही यह मेहनतकश वर्ग जबरदस्त आर्थिक दबाव के नीचे दब गया है। ऐसे हालात में बनें, संगठन में जैसा कि मैंने कहा है, विषमता को