74 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
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* राष्ट्रीय एकता की भावना का - विनाशक है हिन्दू-मुस्लिम
विभाजन
मंगलवार दिनांक 18 जनवरी, 1938 से मुम्बई प्रांतिक एसेंब्ली की बैठक का प्रारंभ हुआ। ना. पाटील ने लोकल बोर्ड कानून सुधार बिल एसेंब्ली में रखा। इस बिल में नॉमिनेशन की पद्धति को रद्द किया गया है। उसकी जगह अस्पृश्य और महिला वर्ग को संयुक्त चुनाव क्षेत्र में जगहें आरक्षित रखी गई हैं।
इस प्रस्ताव के पक्ष में बोलते हुए बताया गया कि आज तक सरकार की ओर से नियुक्त सदस्यों को चुने जाने के कारण लोकतांत्रिक पद्धति की अनदेखी हुई थी। सरकार ने पहल करते हुए राष्ट्रीयता की राह में रोड़ा बनी इस पद्धति को खत्म कर दिया गया है। इस अनिष्ट पद्धति को नए विधिमंडल से हटा दिया गया है। इस तरह स्थानीय स्वराज से भी उसे खत्म कर दिया जाना चाहिए। सर अली महंमद देहल्वी ने मुसलमान समाज के लिए स्वतंत्र लेबर पार्टी की क्यों आवश्यकता है इसका प्रतिपादन किया। उसके बाद स्वतंत्र लेबर पार्टी के नेता डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर ने जोरदार भाषण दिया। डॉ. साहब के भाषण के दौरान सभागृह में गंभीरता छाई थी। इसके बावजूद काँग्रेस के बेलगांव के प्रतिनिधि श्री गोखले ने बीच में थोड़ी गड़बड़ी की। उन्हें जबरदस्त जवाब देकर डॉ. बाबासाहेब ने अपने भाषण में कहा, इस सुधार बिल में बहुत कम उन्नति के अलावा और कुछ नहीं है। इस बिल की संयुक्त मतदान पद्धति के बारे में मुझे कुछ नहीं कहना है क्योंकि, पुणे करार के कारण मैं संयुक्त मतदान पद्धति के पक्ष में बंधा हूं। इसके बावजूद इस पद्धति के बारे में मैं अपना नजरिया आपके सामने रखने जा रहा हूं। संयुक्त मतदान पद्धति को मान्यता देने के बाद क्या बदलाव नजर आए यह अगर देखा जाए तो पता चलेगा कि, केवल चुनाव के दिनों में ही हिन्दू-मुसलमान जातियां मतदान के लिए इक्ट्ठा होंगी, अपने मत देंगी। लेकिन इससे इन दोनों समाजों की मानसिकता में क्या बदलाव होंगे? राष्ट्रीय एकता की जिस भावना के लिए संयुक्त मतदान पद्धति पर अमल किया जा रहा है क्या उससे कोई बदलाव होंगे? चुनाव के दिनों के बाद वे दोनों समाज विभक्त ही रहेंगे। व्यावहारिक नजरिए से देखें तो ये भिन्न धर्मों के समाज बंधु कभी भी एक साथ एक चॉल में नहीं रह सकेंगे। साथ-साथ खा नहीं पाएंगे, बेटी व्यवहार
* जनताः 12 जनवरी, 1938