117 12.2.1938 चातुर्वर्ण्य के कारण हिन्दुस्तान की अवनति और पतन हुआ है - सटाणा - Page 97

76 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

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* चातुर्वर्ण्य के कारण हिन्दुस्तान की अवनति और पतन हुआ है

शनिवार 28 फरवरी, 1938 की सुबह 9 बजे डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर परिषद के लिए मनमाड से सटाणा के लिए निकले। रास्ते में चांदवड और कुछ अन्य जगहों पर उन्हें फुलमालाएं अर्पण कर उनका स्वागत किया गया। दोपहर 11 बजे डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर, श्री देवराव नाईक, प्रधान, कवली, गणपतराव, निले, रोकडे, भोले, भाऊराव गायकवाड और नासिक जिलायुवक संघ के 20 स्वयंसेवियों की एक गाड़ी समेत सटाणा पहुंचे। सटाणा के श्री अभिमान पाटील, धर्मा तानाजी पाटील और अन्य महत्वपूर्ण लोग स्वागत के लिए दो मील आगे तक पहुंचे थे। सटाणा की प्रमुख सड़कों से डॉ. बाबासाहेब का जुलूस गुजारा। उनके स्वागत में पूरे गांव में पताकाएं लगाई गई थीं। गांव के ऊपरी हिस्से में यशवंतराव महाराज के मंदिर के पिछवाड़े नदी के पात्र में बनाए गए भव्य मंडप में परिषद की तैयारी की गई थी। परिषद के स्वागताध्यक्ष महंत नानकदास ने डॉ. बाबासाहेब का और वहां उपस्थित मेहमानों का स्वागत किया। फिर प्रस्ताव रखा गया कि परिषद का अध्यक्ष स्थान डॉ. बाबासाहेब स्वीकारें। प्रस्ताव का परिपाटी के अनुसार समर्थन किए जाने के बाद डॉ. बाबासाहेब ने अध्यक्ष स्थान स्वीकारा। परिषद में श्री भोले, देवराव, नाईक, भाऊराव गायकवाड आदि के भाषण हुए। उसके बाद तालियों की गड़गड़ाहट के बीच और जनता द्वारा किए जा रहे जय घोषण की गूंज में डॉ. बाबासाहेब बोलने के लिए उठकर खड़े हुए। डॉ. बाबासाहेब ने कहा,

भाइयो और बहनों,

रेल कामगारों की मानमाड में हो रही परिषद के लिए इस तरफ आया हूं और मुझे आपके इलाके में आने का मौका मिला इसकी मुझे खुशी है। इस यात्रा के पीछे मेरा मुख्य उद्देश्य है अपने राजनीतिक दल-स्वतंत्र लेबर पार्टी का प्रचार करना। आज के इस अवसर पर भी स्वतंत्र लेबर पार्टी की महति के अलावा अन्य कुछ बताने का प्रयोजन मुझे दिखाई नहीं देता। आज की सभा में कई स्पृश्य माने गए बंधु भी उपस्थित हैं यह देखकर मुझे खुशी हो रही है। पहले जब हमारी सभाएं हुआ करती थीं उनमें भी स्पृश्य माने गए कुछ लोग उपस्थित रहा करते थे लेकिन वे लोग यह देखने के लिए जुटते थे कि हमारी सभा में क्या तमाशा हो रहा है। आज हालात वैसे नहीं रहे। इसलिए मैं भी इस सभा में छुटपुट भाषण करने के बजाय थोड़ा अलग भाषण करूंगा।

* जनताः 26 फरवरी, 1938