प्रांतीय स्वायत्तता
अध्याय 1
प्रांतीय सरकार और भारत सरकार का संबंध
यह स्पष्ट है कि कार्यपालिका का दायित्व किसी काम का नहीं रहेगा, यदि
किसी प्रांतीय कार्यपालिका को प्रांतीय विधायिका के अधीन न रखकर प्रांत से बाहर
किसी संस्था के अधीन रखा जाए या अपने अधिकारों के प्रयोग के मामले में प्रांतीय
विधायिका अपने क्षेत्र में सर्वोपरि होकर किसी अन्य अधिकार के अधीन हो जाए। दूसरे
शब्दों में उत्तरदायी शासन स्वायत्त बनाने के लिए यह आवश्यक है कि प्रांतीय और
केन्द्र सरकारों के अधिकारक्षेत्र स्पष्ट रूप से निर्धारित कर दिए जाएं।
1919 के पूर्व प्रांतीय सरकार से भारत सरकार अधिनियम की धारा 45 के
अनुसार अपेक्षा की जाती थी कि वह गवर्नर जनरल-इन-काउंसिल के आदेशों का
पालन करे और उसे सतत रूप से और कर्मठता से अपनी कार्यवाहीयों की या उन
सभी मामलों की सूचना भेजती रहे, जो उसकी राय में उसे भेजना जरूरी हो या जिनके
विषय में उसे सूचना की आवश्यकता हो और अपने प्रांतों के प्रशासन से संबंधित सभी
मामलों में जिन पर उसका अधीक्षण, निर्देशन तथा नियंत्रण हो। इसका मतलब है कि
प्रांतीय सरकारों को अपने प्रशासनिक मामलों में कोई मान्य प्राधिकार प्राप्त नहीं था।
जो भी अधिकार उसे प्राप्त थे, वे उसे केन्द्र सरकार ने अपनी ओर से उसी प्रकार सौंप
रखे थे, जिस प्रकार एक मालिक अपने एजेन्ट को सौंपता है। 1919 के अधिनियम द्वारा
केन्द्रीय सरकार से प्रांतीय सरकार का यह संबंध अधिनियम के अधीन बनाए गए
उपबंधों तथा नियमों का दास बना दिया गया। 1919 के अधिनियम की धारा 45 (1)
(ख) में उपबंध किया गया ‘‘प्रांतीय विषयों के बारे में स्थानीय सरकारों को प्राधिकार
सौंपने के लिए और उन सरकारों को राजस्व और अन्य राशियों के आवंटन के लिए
धारा 45 (3) में व्यवस्था की गई,’’ जहां तक हस्तांतरित विषयों का संबंध है, ‘‘इस
अधिनियम के अधीन गवर्नर जनरल-इन-काउंसिल में स्थानीय सरकारों के अधीक्षण,
निर्देशन तथा नियंत्रण संबंधी जो अधिकार निहित हैं, वे केवल ऐसे प्रयोजनों के लिए
काम में लाए जाएंगे, जिन्हें इस अधिनियम के अधीन बनाए गए नियमों में विनिर्दिष्ट