84 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
किया जाए। किन्तु गवर्नर-जनरल-इन-काउंसिल इस बात की एकमात्र निर्णायक होगी कि विशेष मामले में ऐसे अधिकारों का प्रयोग इस प्रकार विनिर्दिष्ट प्रयोजनों के भीतर आता है या नहीं।’’ इसलिए 1919 के अधिनियम में दो परिवर्तन किए गए : (1) उसने प्रांतों को उनका अपना प्राधिकार प्रदान किया। वह भारत सरकार के एजेण्टों के रूप में प्राप्त प्राधिकार से भिन्न था। (2) अधिनियम ने उन्हें उनके इस पूर्ववर्ती दायित्व से मुक्त कर दिया कि वे उन विषयों के बारे में भारत सरकार की आज्ञा का पालन करें, जो मंत्रियों को हस्तांतरित कर दिए गए थे, लेकिन निरीक्षण के अधिकार उसने अपने पास रखे। इससे यह स्पष्ट है कि भले ही मंत्रियों को सभी विषयों का नियंत्रण पूर्णतः दे दिया जाए, परन्तु हस्तांतरण सदा ही भारत सरकार के अधीक्षण के अधिकार के अधीन रहेगा। उसका अर्थ होगा कि प्रांतीय सरकार की काम करने की आजादी में हस्तक्षेप हो सकता है। सवाल यह है कि क्या अधीक्षण का अधिकार आवश्यक है, यदि आवश्यक है तो क्या केन्द्र और प्रांतों की सरकारों के बीच संबंधों का कोई अन्य रूप सोचा जा सकता है, जिसमें इन अधिकारों को इस प्रकार स्थान दिया जाए कि उनका टकराव प्रांत की स्वायत्तता से न हो।
1919 के अधिनियम और उसके अधीन बनाए गए नियमों द्वारा प्रांतीय विषयों को केन्द्रीय विषयों से अलग कर दिया गया है। इसके बावजूद प्रांतीय विधायिकाओं को प्रांतीय विषयों पर कानून बनाने के बारे में कार्य करने या कार्य को अंतिम रूप देने की आजादी नहीं दी गई है। प्रांतीय विधायिका के अधिकारों को दो अलग-अलग तरीकों से सीमित किया गया है। धारा 80 क में परिभाषित कतिपय मामलों के बारे में गवर्नर जनरल की अनुमति के बिना न वह किसी कानून को बना सकती है और न ही उस पर विचार कर सकती है। भले ही उसका संबंध प्रांतीय क्षेत्र के मामले से क्यों न हो। कुछ अन्य मामलों के बारे में प्रांतीय विधायिका कानून पारित कर सकती है, किन्तु यदि कानून धारा 80 क और उसके अधीन बनाए गए नियमों के दायरे में आता है, तो उस पर गवर्नर जनरल वीटो का इस्तेमाल कर सकता है। पर इन दो प्रतिबंधों से प्रांतीय स्वायत्तता के सम्मिलित प्रभाव को आसानी से समझा जा सकता है। सवाल यह है कि क्या प्रांत और केन्द्र की सरकारों के बीच संबंधों की कोई दूसरी प्रणाली सोची जा सकती है, जिसमें केन्द्रीय सरकार के अधिकारों का टकराव प्रांतों की स्वायत्तता से न हो।
प्रांतीय विषयों के प्रशासन के मामले में प्रांतीय सरकार पर केन्द्रीय सरकार के पर्यवेक्षण का उपबंध तथा प्रांतीय विषयों के बारे में प्रांतीय कानून बनाने के लिए केन्द्रीय सरकार की पूर्व स्वीकृति तथा पश्चात्वर्ती वीटो की शक्ति का उपबंध एक ऐसा विचित्र लक्षण है, जो किसी ऐसे अन्य देश के संविधान में नहीं पाया जाता जहां सरकार के कामों को केन्द्रीय तथा प्रांतीय जैसे दो राजनीतिक निकायों के बीच