88 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
के उन क्षेत्रों से की जाए, जो स्वयं भारत के बाहर अज्ञात और अनाम हैं? यदि ऐसा है तो सम्राट की सरकार केवल एक ही भारतीय प्राधिकार यानी भारत सरकार को मानेगी और भारत से संबंधित हर मामले में उसी सरकार से लिखापढ़ी करेगी और केवल उसी से या उसी के माध्यम से संदेश प्राप्त करेगी। दूसरा प्रश्न यह है कि क्या प्रांतीय सरकारों का कानून की दृष्टि से कोई राजनीतिक अस्तित्व है? यदि कहा जा सके कि उनका अस्तित्व है, तो सम्राट की सरकार को उन्हें मान्यता देनी होगी और प्रांतीय मामलों में उनसे लिखापढ़ी करनी ही होगी तथा उनसे संदेश प्राप्त करना ही होगा। संबंध के दोनों संभावित आधारों में से दूसरा अधिक उचित है। प्रांतों का स्वतंत्र राजनीतिक अस्तित्व आजकल एक सिद्ध तथ्य है। उनका एक कार्यक्षेत्र होता है, जहां उनका अपना प्राधिकार होता है। सुधारों की समुची योजना प्रांतीय सरकारों को केन्द्र के अधीन रखने के विरुद्ध है। प्रांत के मुख्य कार्यपालिका को केन्द्रीय सरकार का प्रमुख मनोनीत नहीं करता। वह प्रांत में सम्राट का प्रतिनिधि है, गवर्नर जनरल का नहीं। संविधान बहुत्ववादी है और उसमें इस दृष्टिकोण के पक्ष में ऐसा कुछ नहीं कि देश के भीतर इसे बहुत्ववादी माना जाए, जिसमें हरेक को अलग - अलग अधिकार दिए गए हों और सम्राट की सरकार इसे केवल एक उत्तरदायी सरकार वाला एकात्मक संविधान माने।
वे कौन से मामले हैं, जिनमें प्रांतीय सरकारों के इस अधिकार को माना जा सकता है कि वे ‘ब्रिटिश सरकार’ से सीधा सम्पर्क कर लें? आस्ट्रेलिया के राष्ट्रकुल की भूमिका है कि वहां सम्राट की हैसियत केवल सरकारी गठन के अंग के रूप में होती है, वहां लिखापढ़ी सीधे राज्य के गवर्नर और औपनिवेशक कार्यालय के बीच चलती है, गवर्नर जनरल उसमें दखल नहीं देता। इस भूमिका का अनुकरण करते हुए प्रांतीय सरकारों की तरफ से दावा किया ही जाना चाहिएं कि उन्हें केन्द्रीय सरकार के हस्तक्षेप के बिना ‘ब्रिटिश सरकार’ से सीधे संपर्क का अधिकार दिया ही जाए। जिन मामलों में उन्हें ऐसे अधिकार दिए ही जाने चाहिए, वे हैं, आरक्षण, प्रांतीय कानून बनाने की स्वीकृति और अस्वीकृति, प्रांतीय गवर्नरों की नियुक्ति और बर्खास्तगी और उनके अनुदेश, प्रांतीय संविधानों में संशोधन, अन्य मामले जो पूर्णतः किसी भी सरकारों के हों। उन मामलों का क्या होगा, जो पूर्णतः किसी भी सरकार के नहीं हैं? मेरा सुझाव है कि ऐसे मामलों में जहां केन्द्रीय सरकार को विधायन का सर्वोपरि अधिकार है, वहां केन्द्रीय सरकार भारत की एकमात्र प्रतिनिधि है। लेकिन जो मामले केन्द्रीय तथा प्रांतीय सरकार के समवर्ती अधिकार - क्षेत्र में हैं, उनमें प्रांतीय सरकार को सीधे प्रतिनिधित्व का अधिकार है।
यह एक वास्तविकता है कि भारत सरकार के नियंत्रण से मुक्त एक इकाई के रूप में प्रांतों का राजनीतिक अस्तित्व हो और प्रांतीय कार्यपालिका और प्रांतीय विधायिका