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प्रांतीय स्वायत्तता

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में वर्तमान की अपेक्षा सम्राट का प्रतिनिधित्व और अधिक उजागर हो। वर्तमान कानून के अधीन भारत मंत्री ने सम्राट को एकदम पृष्ठभूमि में रख दिया है और वास्तव में उसका स्थान हड़प लिया है। भारत के लिए भारत मंत्री का कार्यालय उपनिवेशों के लिए सेक्रेटरी ऑफ स्टेट के कार्यालय जैसा ही है। परन्तु दोनों की भूमिकाएं नितांत भिन्न हैं। डोमिनियनों की वैधानिक विधि में उपनिवेशों के लिए सेक्रेटरी ऑफ स्टेट का कोई महत्व नहीं होता। सभी डोमिनियनों के संवैधानिक कानूनों में यह स्पष्ट उल्लेख होता है कि उनकी कार्यपालिका और विधायिका का प्रशासन सम्राट में निहित है। भारत सरकार अधिनियम की धारा 2 में भारत मंत्री को निश्चित कानूनी दर्जा दिया गया है। भारत मंत्री का दर्जा इतना प्रखर है कि उसने सम्राट के दर्जे को ग्रस लिया है। वास्तविकता यह है कि भारत सरकार अधिनियम की धारा 1 में सरसरी उल्लेख के अलावा भारत सरकार अधिनियम में अन्यत्र कहीं भी सम्राट का कोई उल्लेख नहीं है। निस्संदेह इसके कारण ऐतिहासिक और बहुत पुराने हैं। उनकी कहानी 1773 के विनियमन अधिनियम के पारित होने से शुरू होती है। तब ईस्ट इंडिया कम्पनी ने पूरब में अर्जित अपने स्वत्वों के बारे में सम्राट के अधिकार पर आपत्ति उठाई थी। ऐतिहासिक मतभेद कुछ भी रहे हों, डोमिनियन कानून सेक्रेटरी ऑफ स्टेट को कोई मान्यता नहीं देता है, जबकि भारतीय कानून देता है। परिणाम यह हुआ कि उपनिवेशों का सेक्रेटरी ऑफ स्टेट डोमिनियनों पर शासन नहीं करता। उसका कर्तव्य है कि वह सम्राट को यह सलाह दे कि वह डोमिनियन सरकारों के अधिनियम विशेष, को स्वीकार करे या न करे। दूसरी ओर भारत मंत्री सम्राट का सलाहकार मात्र नहीं है। भारत सरकार अधिनियम की धारा 2 के अनुसार उसे सरकार के पूरे - पूरे अधिकार प्राप्त हैं।

  1. धारा 2 में वर्णित उपबंधों को किसी भी हालत में न्यायसंगत नहीं ठहराया जा सकता। वे सम्राट के दर्जे की अवमानना और भारत मंत्री की सही स्थिति को विकृत करते हैं। वे प्रांतीय सरकारों की स्थिति की गलत तस्वीर पेश करते हैं। 1919 से पहले धारा 2 का कोई भी औचित्य क्यों न हो, परन्तु उस साल जो परिवर्तन उसमें किए गए, उन्होंने इसे पूर्णतः हटा दिया था। जनता को प्रशासन के अधिकार दिए जा रहे हैं, इसलिए वे अधिकार भारत मंत्री के हाथों में बरकरार रखना संभव नहीं है। इसके लिए दोहरी शासन प्रणाली लागू करनी होगी, जिससे गंभीर टकरावों की संभावनाएं उत्पन्न होंगी। इसलिए मैं सिफारिश करता हूँ कि धारा 2 को भारत सरकार अधिनियम से हटा दिया जाए और इसके स्थान पर दो नई धाराएं जोड़ दी जाएं, जो इस प्रकार हों :

  2. प्रांतों की विधायी शक्ति प्रांतीय संसद में निहित होगी, जिसके अंग होंगे

सम्राट और सम्राट की एक परिषद् और प्रतिनिधियों की परिषद् जिसे अब से

‘प्रांतीय विधायिका’ कहा जाएगा।

  1. प्रांतों की कार्यपालक शक्ति सम्राट में निहित की जाती है और उसका उपयोग