5. लोक सेवाएं - Page 108

परिच्छेद
लोक सेवाएं

सेवाओं का पुनर्गठन

  1. सेवाओं का विभाजन : भारत में लोक सेवा का वर्तमान गठन एचीसन कमीशन की सिफारिशों के अनुसार हुआ। इस कमीशन ने 1886 - 87 में भारतीय लोक सेवा की जांच पड़ताल की। कमीशन की नियुक्ति से पूर्व उच्च दायित्वों और उपलब्धियों वाले पद अधिकांशतः यूरोप के रंगरूटों से भरे जाते थे। कमीशन से स्पष्टतः कहा गया कि वह ऐसे उपायों का सुझाव दे, जिनके द्वारा लोक सेवा में तथा व्यापक सेवा नियोजन के लिए भारतवासियों के दावों के साथ पूर्ण न्याय हो सके। आयोग का विचार था कि सिविल सेवा में केवल कुलीन - वर्ग ही होना चाहिए। अतः उसने सिफारिश की कि इंग्लैंड में अधिकारियों की भरती काफी कम कर दी जाए और इस प्रकार जो उच्च नियुक्तियां बच जाएं, उन्हें भारत में भारत से ही भरती किए जाने वाले लोगों की सेवा को सौंप दिया जाए। इन सिफारिशों के फलस्वरूप इंग्लैंड में भरती किए गए अधिकारियों से शाही सेवाओं का गठन हुआ और भारत से भरती किए गए अधिकारियों से प्रांतीय सेवाओं का गठन। वेतन, अवकाश और पेंशन के संबंध में दोनों सेवाओं के अधिकारियों की नियुक्ति की शर्तें स्वतंत्र आधार पर निश्चित होती थीं और उनका एक - दूसरे से संबंधित होना जरूरी नहीं था। देश की अधिकांश सिविल सेवाओं में शाही और प्रांतीय का यह विभाजन बना हुआ है। उसके विस्तार में जाना बेकार है। जो महत्वपूर्ण बात ध्यान में रखनी है, वह यह है कि यह विभाजन इसलिए किया गया कि इंग्लैंड में भरती किए गए अधिकारियों के बीच स्पष्ट भेद किया जा सके। जैसा कि विवरण से दिख सकता है, यह विभाजन इसलिए नहीं किया गया था कि अखिल भारतीय सेवा के लिए सक्षम तथा भारत सरकार के अधीन रखे जाने वाले अधिकारियों का स्पष्ट भेद उन अधिकारियों से किया जाए जो स्थानीय सरकारों के अधीन रखें जाएं और केवल विशिष्ट प्रांतों में ही सेवा कर सकें। उदाहरण के तौर पर टेलीग्राफ (इंजीनियरिंग) तथा भारतीय सर्वेक्षण विभाग में प्रांतीय सेवाओं के जो अधिकारी हैं, वे सीधे भारत सरकार के अधीन हैं और वे किसी प्रांत विशेष तक सीमित नहीं रहते, जब कि शिक्षा और पुलिस विभागों में शाही सेवा के अधिकारी विभिन्न प्रांतों को आवंटित