5. लोक सेवाएं - Page 109

92 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय

कर दिए जाते हैं। मेरे विचार में अब समय आ गया है, जब प्रत्येक प्रांत स्वतंत्र रूप से अपनी प्रशासनिक सेवाओं का गठन करे। इसके लिए सेवाओं का अखिल भारतीय स्वरूप समाप्त करना ही होगा। केन्द्रीय सरकार की अपनी जरूरतों के अनुसार केन्द्रीय सिविल सेवा में भरती की जाए और उसकी देखभाल की जाए। यह सेवा उन विभिन्न विभागों को चलाए, जिन्हें भारत सरकार उसे सौंपे पर उसके सदस्यों पर यह दायित्व न थोपा जाए कि वे किसी प्रांतीय सरकार की सेवा करेंगे। इसी प्रकार हर प्रांतीय सरकार केवल अपने उपयोग के लिए अपनी जरूरतों के अनुसार एक प्रांतीय सिविल सेवा का गठन और उसकी देखभाल करे। इस सिफारिश से मौजूदा प्रणाली में बहुत परिवर्तन नहीं आएगा, क्योंकि भले ही शाही सेवा और प्रांतीय सेवा के अधिकारी भारत के किसी भी भाग में सेवा कर सकते हैं, पर उनका अखिल भारतीय स्वरूप नाममात्र का है। ऐसे मामले बहुत कम हैं, जब चाहे शाही सेवा हो या प्रांतीय सेवा, सिविल सेवा के किसी अधिकारी को उस प्रांत से बाहर सेवा करने के लिए बुलाया गया हो, जिसमें उनकी मूल रूप से नियुक्ति की गई हो। आमतौर से उनमें से लगभग सभी उसी प्रांत से अंत तक काम करते रहें, जहां शुरू में उनकी नियुक्ति हई थी। जब स्थिति ऐसी है, तो जिस सुधार का सुझाव मैंने दिया है, उससे कोई परिवर्तन नहीं होगा। वह केवल मौजूदा तथ्यों को मान्यता देगा।

  1. सिविल सेवा के गठन में इस सुधार पर जो बल मैं दे रहा हूँ, उसके कई आधार हैं। सर्वप्रथम तो सेवाओं का ऐसा विभाजन कि जो इस अर्थ में केन्द्रीय हैं कि वे भारत सरकार की सेवा करें और जो इस अर्थ में प्रांतीय हैं कि वे प्रांतीय सरकार की सेवा करें, उसका एक भारी लाभ यह है कि यह एक ऐसा सुधार है जिसकी खास जरूरत है और उसे प्रांतीय सरकार के स्वरूप में परिवर्तन करके करना होगा। यदि मौजूदा प्रणाली चलती रही तो मंत्रिगण अपना दायित्व पूरा नहीं कर सकेंगे। इसमें संदेह नहीं कि भारत सरकार अधिनियम की धारा 98 (ख) के अनुसार भारत के लोक सेवक अपना पद सम्राट के प्रासाद पर्यन्त धारण करते हैं। लेकिन यह याद रखना होगा कि अधिनियम मंत्रियों को यह निर्णय करने का अधिकार नहीं देता कि कब महामहिम अपने प्रासाद से उसे पद से अलग करे। यद्यपि यह अधिकार उसे नियुक्त करने वाले आधिकारी को दिया गया है, फिर भी बर्खास्त किए गए अधिकारी को यह अधिकार है कि वह भारत मंत्री से अपील करे। केवल यही बात नहीं है कि मंत्री को अधिकारी को बर्खास्त करने का कोई अधिकार नहीं है, बल्कि यह भी है कि दंड मुक्ति के कारण वह उसे दंडित भी नहीं कर सकता। क्योंकि कानून में यह व्यवस्था है कि यदि सेक्रेटरी ऑफ स्टेट-इन-काउंसिल द्वारा नियुक्त कोई अधिकारी सोचता है कि गवर्नर के प्रांत में किसी वरिष्ठ अधिकारी ने अपने आदेश से उसके साथ अन्याय किया है तो उसे अधिकार है कि वह गवर्नर से शिकायत करे और गवर्नर कानून के अधीन और साथ ही अनुदेश - पत्र के अनुसार उसकी जांच करने को बाध्य है और उसे ऐसे