लोक सेवाएं
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आदेश देने होंगे, जो उसे न्यायसंगत और निष्पक्ष दीख पड़ें। इन प्रावधानों के कारण कोई भी मंत्री चाहे वह कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो, वह सिविल सेवा के उस हठधर्मी अधिकारी के समक्ष विशेष हो जाएगा, जो उस नीति का पालन न करे, जिसके लिए मंत्री विधायिका की इच्छानुसार उसके प्रति उत्तरदायी है। मंत्री पद का दायित्व अपेक्षा करता है कि मंत्री को यह अधिकार होना चाहिए कि वह अपने अधीन गलत कार्य करने वाले अधिकारी से कारगर ढंग से निपट सके। उसे यह फैसला करने का अधिकार होना ही चाहिए कि कितने अधिकारी उसके पास हों और किस अधिकारी को किस पद पर वह नियुक्त करे। मौजूदा प्रावधान उसे वे अधिकार नहीं देते, जिनकी उसे सख्त जरूरत पड़ेगी ही। इस विसंगति को ली आयोग ने पहचाना जिसका गठन सुधार लागू करने के तुरंत बाद किया गया था। उस आयोग ने सिफारिश की कि हस्तांतरित विभागों में अखिल भारतीय स्तर पर और आगे नियुक्तियां न की जाएं और भविष्य में उनके लिए वांछित अधिकारियों की भरती और नियुक्ति प्रांतीय सरकारें करें। इस सिफारिश के अनुसार प्रांतीय सरकारों को यह अधिकार दिया गया है कि वे उन अधिकारियों की भरती के लिए नियम तैयार करें जो हस्तांतरित विभाग में स्थान रिक्त होने पर उस विभाग में काम करने वाले इन सेवाओं के वर्तमान अखिल भारतीय सेवा के अधिकारियों का स्थान लेंगे। मेरा सुझाव उसी सिद्धान्त का विस्तार मात्र है, जिसकी आवश्यकता को अधिकारी स्वीकार करने के लिए विवश हैं। इस विस्तार में अब विलम्ब नहीं किया जा सकता, क्योंकि एक पूर्णतः उत्तरदायी शासन प्रणाली में ‘आरक्षित’ और ‘हस्तांतरित’ के बीच का भेद समाप्त करना होगा।
- पृथक और स्वतंत्र प्रांतीय सिविल सेवा का एक दूसरा लाभ यह होगा कि प्रांतीय सरकारों को यह छूट होगी कि वे प्रांत की सेवाओं के काडर में फेरबदल कर सकें। अखिल भारतीय प्रणाली की कमी यह है कि यदि कोई मंत्री संतुष्ट हो जाता है कि ऐसे उनके फालतू पद हैं जिन पर सामान्यतया अखिल भारतीय सेवा के अधिकारी डटे हुए हैं और उनमें से अधिकांश पदों के कर्तव्यों का पालन प्रांतीय सेवाओं के अधिक अल्प वेतन भोगी अधिकारी कर सकते हैं और अस्थायी रिक्त स्थानों पर इस कर्तव्य का दक्षता से पालन उन्होंने किया भी है, अतः ऐसे पद को समाप्त कर दिया जाए या उसे प्रांतीय सेवा के काडर को सौंप दिया जाए, तो मंत्री स्वयं को ऐसा करने में असमर्थ पाता है, क्योंकि कानून के अधीन उसके पास ऐसा कोई अधिकार नहीं है। वह अधिक से अधिक यह कर सकता है कि उन्हें खाली पड़ा रहने दे या प्रांतीय सेवा के किसी अधिकारी को लम्बे समय तक उस पर कार्य करने दे। परंतु इस मामले में भी उसके अधिकार सीमित हैं, क्योंकि इन नियमों के अनुसार उसे कुछ नियत महीनों के पश्चात् भारत मंत्री से अनुमति लेनी होगी। सेवाओं के अखिल भारतीय गठन से उत्पन्न यह एक अति गंभीर बाधा इस दृष्टि से है कि वह बचत के उन लक्ष्यों की प्राप्ति में बाधक है जिनके लिए ‘संशोधित परिषद्’ अपने गठन काल से ही दुहाई देती रही है।