लोक सेवाएं
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जाति के हित - संवर्धन के लिए अपने पदों का सहज ही दुरुपयोग कर सकते हैं। वे आम जनता का हित नहीं देखते। मामलातदार के सामान्य उदाहरण को ही लें, जो काश्तकारी के लिए सरकारी जमीनों को पट्टे पर देने के कानून को लागू करता है। इसमें संदेह नहीं कि वह केवल कानून को लागू करता है, परन्तु उसे लागू करते समय वह अपनी रुचि के अनुसार पट्टेदारों का चयन कर सकता है और इस बात की बहुत संभावना है कि वह पट्टेदारों के विरुद्ध ऐसे आधारों पर निर्णय कर ले, जो वास्तव में तो सांप्रदायिक हों पर देखने में असांप्रदायिक हों। जनगणना के प्रभारी अधिकारी के एक अन्य उदाहरण को लें। वह विभिन्न जातियों की नामावली और उनकी सामाजिक स्थिति के प्रश्नों का निर्णय करता है। इस विभाग का प्रभारी अधिकारी एक जाति विशेष का होने के कारण अपने प्रशासन के दौरान प्रतियोगी जाति के साथ अन्याय कर सकता है और संभवतः वह उसे उचित नाम व दर्जा न दे। मुख्यतः नस्ल व जाति के आधार पर पक्षपात आम बात है, भले ही बहाने के रूप में कोई अन्य सत्य आभासी आधार खोज लिया जाता है। लेकिन मैं मद्रास प्रेसिडेंसी के विश्वकर्माओं का एक अन्य उदाहरण प्रस्तुत करना चाहूंगा। उन्होंने 1924 में सुधार जांच समिति को एक पत्र लिखा था। उसमें उसका वर्णन है। उसमें शिकायत की गई थी, ‘‘मद्रास कार्यकारी परिषद् के एक ब्राह्मण सदस्य तब श्री पी. शिवास्वामी अय्यर ने जब वह विधि विभाग के प्रभारी थे, एक सरकारी आदेश जारी किया, जिसमें विश्वकर्माओं के नाम के साथ आचार्य जोड़ने पर एतराज किया गया, जबकि आमतौर से विश्वकर्मा नाम के साथ आचार्य लिखते हैं और इसके स्थान पर ‘आस्त्र’ लगाने का आदेश दिया, जिसका मतलब है सरेआम घृणास्पद संबोधन। यद्यपि विधि - सदस्य के इस आदेश को उचित ठहराने की न तो आवश्यकता थी और न ही प्राधिकार था, फिर भी विधि विभाग ने सरकारी आदेश प्रकाशित करा दिया जैसे कि वह वर्तनी अशुद्धि समिति की सिफारिश हो। दुर्भाग्य की बात है कि समिति के अधिकांश गैर - सरकारी सदस्य ब्राह्मण जाति के थे। उन्होंने अपनी साथी जातियों का सम्मान करना तो कभी सीखा ही नहीं था। न ही कभी उन्होंने हमें निर्णय के आधार से सूचित किया। यह तो अंधेरे में छुरा भौंकना हुआ।
- यह अवश्यंभावी है। निश्चय ही जाति राज का अर्थ है, जाति - हित और जाति - विद्वेष के आधार पर राज करना। यदि ऐसे ही परिणाम निकलेंगे, तो हर ईम ानदार व्यक्ति के मन में यह सवाल उठेगा कि क्या दक्ष प्रशासन ने हमें उत्तम प्रशासन भी प्रदान किया है, यदि नहीं तो उपाय क्या है? मेरा विचार है कि ब्राह्मण तथा संबद्ध जातियों के अधिकारियों के वर्ग - पक्षपात से उपजे अलाभों का पलड़ा उनकी दक्षता से उपजे समूचे लाभों के पलड़े से भारी है। कुल मिलाकर उन्होंने लाभ से ज्यादा हानि पहुंचाई है। इसके बारे में मेरे विचार से एक उपाय यह है कि लोक सेवा में विभिन्न जातियों के लोगों का समुचित सम्मिश्रण हो। इससे हो सकता है कि थोड़ी बहुत