5. लोक सेवाएं - Page 117

100 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय

अदक्षता आए। परन्तु इससे वर्ग पक्षपात का दोष दूर करने का अति उपयोगी उपाय मिल जाएगा। देश में इस समय जो सामाजिक संघर्ष चल रहे हैं, उनके संदर्भ में यह और भी आवश्यक है। ब्राह्मणों और गैर - ब्राह्मणों, हिन्दुओं और मुसलमानों तथा स्पृश्यों, अस्पृश्यों के बीच सभी असमानताएं मिटाने और समानता लाने का जो कटुतापूर्ण संघर्ष चल रहे हैं उससे न तो जज अछूते रहेंगे और न ही मजिस्ट्रेट, सिविल सेवक और न पुलिस अधिकारी। संघर्षरत जातियों के लोग होने के कारण उनमें पक्षपात आना अनिवार्य है। नतीजा यह होगा कि अपने सेवकों के प्रति जनता के विश्वास को गहरा आघात लग सकता है।

  1. अभी तक मैंने पिछड़ी जातियों के मामले पर प्रशासनिक उपयोगिता के आधार पर विचार किया है। परन्तु ऐसे नैतिक आधार भी हैं जिनके कारण लोक सेवा में उनका प्रवेश कराया जाए। किसी व्यक्ति को लोक सेवा से अलग रखने के नैतिक दोष को जितने प्रभावशाली ढंग से स्वर्गीय श्री गोखले ने उठाया है, उतना किसी और ने नहीं। एक जोरदार भाषण में उन्होंने कहा : ‘‘लेकिन विदेशी एजेंसी का एकमात्र दोष यह नहीं है कि वह अति मंहगी है। एक प्रकार का नैतिक दोष उससे भी बड़ा है। वर्तमान प्रणाली के अधीन ‘भारतीय’ जाति को बौना और नगण्य बनाने का एक अभियान चलाया जा रहा है। हमें रोजाना हीनता के वातावरण में रहना पड़ता है और हममें से जो सबसे ऊंचे हैं, उन्हें भी इतना झुकना पड़ता है कि मौजूदा प्रणाली का पेट भरता रहे। ऊपर उठने की भावना, यदि मैं इस अभिव्यक्ति का प्रयोग कर सकूं, जिसे ईटन अथवा हैरो का हर छात्र अनुभव कर सकता है कि किसी दिन वह ग्लैडस्टोन, नेल्सन अथवा वैलिंगटन बन सकता है और जिससे वह अपनी क्षमता के अनुसार सर्वोत्तम प्रयास की प्रेरणा ले सकता है, उससे हम वंचित रह जाते हैं। मौजूदा प्रणाली के अधीन हमारे व्यक्तित्व का पूर्ण विकास कभी हो ही नहीं सकता। नैतिक उत्थान की जिस भावना का हर स्वाधीन जाति अनुभव करती है, उसे हम अनुभव नहीं कर सकते। केवल उपयोग में न आने के कारण हमारी प्रशासनिक तथा सैन्य प्रतिभा धीरे - धीरे लुप्त होती ही चली जाएगी। अंततः एक दिन ऐसा आएगा जब हम केवल लकड़हारे और कहार भर रह जाएंगे।’’ जो लोग लोक सेवा में प्रवेश के लिए पिछड़े वर्गों के पक्ष के औचित्य को अस्वीकार करते हैं, उनसे यह प्रश्न किया जा सकता है कि क्या पिछड़े वर्ग ब्राह्मणों तथा सम्बद्ध जातियों पर वैसा ही आरोप नहीं लगा सकते जैसा कि स्वर्गीय श्री गोखले ने भारतीयों की ओर से विदेशी एजेंसी पर लगाया था? क्या दलित वर्ग, गैर - ब्राह्मण और मुसलमान यह नहीं कह सकते कि लोक सेवा से उन्हें अलग रख कर उनके समुदायों को बौना और नगण्य बनाया जा रहा है? क्या वे यह शिकायत नहीं कर सकते कि बहिष्कार के कारण उन्हें रोजाना हीनता के वातावरण में रहना पड़ता है और उनमें से सबसे ऊंचे को भी इतना झुकना पड़ता है कि वे मौजूदा प्रणाली का पेट भरते रहें। क्या वे छाती ठोक कर नहीं कह