लोक सेवाएं
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सकते कि ऊपर उठने की जिन भावनाओं को ब्राह्मण जाति का हर स्कूली छात्र अनुभव करता है कि एक दिन वह सिन्हा, शास्त्री, रानाडे अथवा परांजपे बन सकता है और जिनसे वह अपनी क्षमता के अनुसार सर्वोत्तम प्रयास की प्रेरणा ग्रहण कर सकता है, उनसे उन्हें वंचित किया गया है। क्या वे क्षोभ से यह नहीं कह सकते कि मौजूदा प्रणाली के अधीन उनके व्यक्तित्व का पूर्ण विकास कभी हो ही नहीं सकता। क्या वे यह रोना नहीं रो सकते कि नैतिक उत्थान की जिस भावना को हर स्वशासी जाति अनुभव करती है, उसे वे अनुभव नहीं कर सकते? क्या वे नहीं कह सकते कि केवल निराशा और कुंठा के कारण उनकी प्रशासन - प्रतिभा धीरे - धीरे समाप्त होती ही चली जाएगी और अंततः वे अपने ही देश में लकड़हारे और कहार बन कर ही रह जाएंगे? इन सवालों का केवल एक ही जवाब है। हां, वे ऐसा कह सकते हैं। उन्नत जातियों को देश की लोक सेवा में प्रवेश से वंचित रखना नैतिक दोष है, तो पिछड़ी जातियों को उसी क्षेत्र से वंचित रखना भी तो नैतिक दोष ही होगा। यह वह नैतिक दोष है, तो उसे दूर भी किया ही जाना चाहिए।
- यही कारण है कि मुझे पिछड़ी जातियों का पक्ष लेना पड़ा। यह ध्यान रखने की बात है कि ये भी वैसे ही कारण हैं, जैसे कि भारतीयकरण के पक्ष में बताए गए हैं। यह भी याद रखना होगा कि भारतीयकरण का पक्ष भी दक्षता पर आधारित नहीं है। वह उस प्रशासन की बैसाखी पर टिका है। इस बात को चुनौती नहीं दी गई है कि दक्ष प्रशासक के लिए, जो गुण जरूरी हैं, उनकी दृष्टि से भारतीय यूरोपीय से घटिया है। इस बात से इंकार नहीं किया गया कि यूरोपीय नौकरशाहों ने हमारी सड़कें सुधारीं, अधिक वैज्ञानिक सिद्धांतों पर हमारी नहरें बनाईं, रेल यातायात शुरू किया, अति सस्ती डाक - व्यवस्था को जन्म दिया, विद्युतगति से संदेश भेजे जाने लगे, मुद्रा में सुधार किया, माप - तौल को विनियमित किया, भूगोल, नक्षत्र विज्ञान और आयुर्विज्ञान संबंधी धारणाएं बदलीं और हमारे आंतरिक झगड़ों को रोका। इस तथ्य का इससे बड़ा और कोई प्रमाण नहीं हो सकता कि यूरोपीय नौकरशाही यथासंभव सर्वाधिक दक्ष प्रशासन प्रणाली है। हालांकि यूरोपीय नौकरशाही दक्ष थी, उसकी फिर भी निंदा की गई, क्योंकि उसमें वे गुण नहीं थे, जो मानवीय प्रशासन में होने चाहिएं। अतः यह कुछ आश्चर्य की ही बात है कि जो भारतीयकरण की दुहाई देते थे, वे ही उसकी धारा पिछड़ी जातियों की ओर मोड़ने का विरोध करते हैं। वे भूल जाते हैं कि भारतीयकरण के पक्ष में पिछड़े वर्गों का पक्ष भी शामिल है। जो भी हो, जितना महत्व मैं प्रांत की स्वायत्तता या प्रांतीय कार्यपालिका के लिए पूर्ण दायित्व को देता हूँ, उससे कहीं अधिक महत्व मैं इस बात को देता हूँ। मैं इतने विशाल अधिकारों को सौंपे जाने के पक्ष में नहीं हूँ, यदि मैं अनुभव करता हूँ कि ये अधिकार एक खास वर्ण को सौंपे जा रहे हैं और दूसरे वर्ण को इनसे दूर रखा जा रहा है। इस दृष्टि से मेरा सुझाव है कि मेरी सिफारिशों पर अमल के लिए निम्न कदम उठाए जाएं :