6. सिफारिशों का सारांश - Page 121

104 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय

अध्याय 3 - विधायिका में 140 सदस्य होने चाहिएं। इनमें से 33 मुसलमानों के और 15 दलित वर्गों के होने चाहिएं। कुछ जिलों का कम और कुछ अन्य जिलों का अधिक प्रतिनिधित्व जनसंख्या - अनुपात से ठीक किया जाना चाहिए। विभिन्न वर्गों और हितों के बीच स्थानों के समायोजन के लिए एक समिति होनी चाहिए। उम्मीदवार के लिए आवास की शर्त हटाई जानी चाहिए।

अध्याय 4 - लखनऊ समझौता स्थायी करार नहीं है और वह इससे उत्पन्न होने वाले मामलों पर नए सिरे से उसके गुण - अवगुण के आधार पर विचार करने पर प्रतिबंध नहीं लगा सकता।

अध्याय 5 - प्रांतों में कोई दूसरा सदन नहीं होना चाहिए।

अध्याय 6 - विधायिका को अधिकार होना चाहिए कि वह अपने अध्यक्ष की नियुक्ति कर सके और उसको पदच्युत कर सके। उसे अपने विशेषाधिकारों और अपने प्रक्रिया - विनियमन को परिभाषित करने का अधिकार होना चाहिए। भारत सरकार अधिनियम की धारा 72 घ और धारा 80 ग कानून - पुस्तिका से हटा दी जानी चाहिए। विधायिका को ‘अविश्वास प्रस्ताव’ प्रस्तुत करने का, अधिकार होना चाहिए। कुछ शर्तों के अधीन रहते हुए विधायिका को संविधान में संशोधन करने का अधिकार होना चाहिए। भाग 4

अध्याय 1 - पूर्ण प्रांतीय स्वायत्तता होनी चाहिए। केन्द्र और प्रांतों के कार्य - विभाजन पर पुनर्विचार किया जाना चाहिए, जिससे की पूर्व - स्वीकृति और पश्चात्वर्ती वीटो के अधिकार के माध्यम से इस समय भारत सरकार का जो नियंत्रण चल रहा है, उसे समाप्त किया जा सके।

अध्याय 2 - प्रांतीय सरकार को सौंपे गए कृत्यों द्वारा नियत सीमाओं के भीतर उस सरकार और ब्रिटिश सरकार के बीच सीधे संबंध होने चाहिएं, केन्द्रीय सरकार के माध्यम से नहीं। भारत सरकार अधिनियम की धारा 2 को हटा दिया जाना चाहिए, क्योंकि यह भारत के प्रशासन के बारे में सम्राट की स्थिति को ग्रस लेती है। भाग 5

एक अलग प्रांतीय सिविल सेवा होनी चाहिए और भारत मंत्री को भरती संबंधी एजेंसी के कार्य का निर्वाह पूर्णतः छोड़ देना चाहिए। सेवा संबंधी उसके कृत्यों का निर्वाह कोई प्रांतीय सिविल सेवा आयोग या भारतीय लोक सेवा आयोग के साथ मिल कर काम करने वाला कोई अधिकारी कर सकता है। सेवाओं का भारतीयकरण अधिक