114 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
संगत प्रयास किए गए, तो दलित जातियों को निराशा ही हाथ लगी, क्योंकि अंग्रेजी सरकार ने जान . बूझकर यह विनिर्णय दिया कि शिक्षा केवल उच्च वर्ग तक ही सीमित रखी जाए। कहीं ऐसा न हो कि तथ्यों को काल्पनिक समझ लिया जाए, इसलिए बंबई प्रेसिडेंसी के बोर्ड ऑफ एजूकेशन के 1850 - 51 के प्रतिवेदन के निम्नलिखित उद्धहरण की ओर ध्यान आकर्षित किया जाता है :
पैरा 5 - कोर्ट ऑफ इस प्रकार इस प्रेंसिडेंसी के शिक्षा बोर्ड ने शिक्षा डायरेक्टर्स के मतानुसार योजना निर्धारित की, जो माननीय कोर्ट से प्राप्त बोर्ड द्वारा निर्धारित प्रणाली डिस्पैचों की प्रमुख निषेधाज्ञाओं के अनुरूप है। डायरेक्टर्स के मतानुसार बोर्ड द्वारा निर्धारित प्रणाली
उसका गौण आधार है, उन लोगों की राय, जो भारत में शिक्षा प्रणाली के विकास पर मनोयोग से विचार करते रहे हैं, यथा आक्लैंड के अर्लमेजर कैंडी तथा अन्य। उसका प्रमुख आधार है स्वयं अति बुद्धिमान स्वदेशी लोगों द्वारा खुलेआम घोषित आवश्यकताएं। हम दोहराते हैं कि परिषद् में मान्यवर न्यायमूर्ति के पूर्ववर्ती ने बोर्ड को सूचित किया था कि यह प्रक्रिया बदली ही जाए।
पैरा 8 - उच्च वर्गों को यदि हमें कहने की अनुमति दी जाए, तो हमें माननीय उच्च वर्गों को
शिक्षित करने के औचित्य कोर्ट के उतने ही सूझबूझ वाले संकेत इस बारे में दीख पर कोर्ट के विचार पड़ते हैं कि वे कौन से क्षेत्र हैं, जिनकी ओर सरकारी पर कोर्ट के विचार
शिक्षा की धारा को मोड़ा जाए, खास तौर पर उस दशा में जब व्यय की इस शाखा के लिए अति सीमित राशि उपलब्ध है। माननीय कोर्ट ने 1830 में मद्रास को इस प्रकार लिखा है, “लेकिन शिक्षा में सुधार से लोगों का मनोबल और आध्यात्मिक स्तर उठाने के सर्वाधिक प्रभावशाली उपाय वे हैं, जिनका संबंध उच्च वर्ग के व्यक्तियों की शिक्षा से होता है। इन लोगों के पास समय होता है और अपने देशवासियों के मन पर उनका सहज प्रभाव होता है। इन वर्गों का शिक्षा - स्तर अंततः उठाकर आप समाज के विचारों और उसकी भावनाओं में कहीं महान और अधिक लाभदायक परिवर्तन ला सकेंगे, अपेक्षाकृत उसके जिसे आप अधिक संख्या वाले वर्ग पर सीधा प्रभाव डालकर लाने की आशा कर सकते हैं। इसके अलावा आप हमारी इस आतुरता से परिचित हैं कि हम चाहते हैं कि हमारे पास सुरुचिपूर्ण स्वभाव और योग्यता से सम्पन्न मूल निवासियों का ऐसा समूह हो, जो अपने देश के सिविल प्रशासन में और अधिक हिस्सा ले सके तथा उसमें और उच्च पद पा सके। अभी तक हमारी भारत सरकार की यह परिपाटी नहीं रही है।” फिर भी हम अन्य अनेक पक्षों से सुनते हैं, हम उन लोगों से भी सुनते हैं जिन्हें यह बात और अच्छी तरह जाननी चाहिए कि जन - वर्ग को शिक्षित करने के लिए भारत के 14 करोड़ लोगों में (क्योंकि संख्या का कोई महत्व नहीं होता) यूरोप की कला और विज्ञान का रस घोलने के लिए कितनी आवश्यकता है और कितनी सुविधा प्राप्त है। हम वैसी ही अन्य सामान्य बातें सुनते हैं, जो इस विषय में भ्रामक धारणाओं से परिपूर्ण हैं। एक दर्शक भी शायद यह सोचने के लिए लालायित हो सकता है कि