116 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
अंग्रेजी शिक्षा 1,699
वर्नाक्यूलर शिक्षा 10,730
संस्कृत शिक्षा 283
(सारणियों से तुलना : 1840 में 97 स्कूल थे और छात्रों की संख्या 5,491 थी, 1850 में स्कूलों की संख्या 185 थी और छात्रों की संख्या 12,712 थी)
पैरा 12 - वही विषय लेकिन अति सक्षम अधिकारियों के आकलन के अनुसार वही विषय
बंबई प्रेसिडेंसी की आबादी एक करोड़ है। एक पिछली रिपोर्ट (1842 - 43, पृष्ठ 26) में उल्लिखित प्रशियाई जनगणना विधि से आकलित आंकड़ों के नियम को यदि हम लागू करें तो इतनी बड़ी जनसंख्या में 7 और 14 वर्ष के बीच के लगभग 9,00,000 नर बच्चे स्कूल जाने योग्य होंगे। अतः इसका अर्थ है कि इस प्रेसिडेंसी की सरकार स्कूल जाने योग्य हर 69 बच्चों में से एक से अधिक बच्चे को शिक्षा प्राप्ति का अवसर नहीं दे सकी है।
पैरा 13 - वही विषय इसके अलावा यह स्वीकार किया गया है कि वर्नाक्यूलर वही विषय
स्कूल में दी गई शिक्षा अच्छे स्तर से कोसों दूर है। श्री बिलोग्बी के विवरण का अधिकांश भाग इन स्कूलों के घटिया स्वरूप और घटिया परिणामों की तीखी आलोचना से भरा पड़ा है। बोर्ड न केवल इस तथ्य को स्वीकार करता है, बल्कि उसने विगत अनेक वर्षों की ओर खास तौर पर संकेत दिया है और कुछ सक्षम प्रेक्षकों की भी राय है कि उसने वर्नाक्यूलर स्कूलों की एक बेहद भद्दी तस्वीर पेश की है। लेकिन जो त्रुटियां बताई गई हैं, उनको दूर करने के प्रत्यक्ष उपाय क्या है? श्री बिलोग्बी ने बहुत ही सही तरीके से बताया है : ‘‘स्कूल मास्टरों का एक उत्तम वर्ग, नारमल स्कूल, अधिक दक्ष पर्यवेक्षण, वर्नाक्यूलर साहित्य में वृद्धि - लेकिन ये वे सब विषय हैं, जिनके प्रति गत अनेक वर्षों से बोर्ड ध्यान देता रहा है और उनकी ओर अतिरिक्त खर्च के बिना एक कदम भी नहीं बढ़ाया जा सकता। लेकिन महामहिम की परिषद् के पत्र से हमें यह पता चला है कि हो सकता है कि आने वाले काफी अर्सें तक सरकार को ऐसा अधिकार प्राप्त न हो कि वह बोर्ड को अतिरिक्त आर्थिक सहायता दे सके।’’
पैरा 14 - निष्कर्ष कि इन तथ्यों से यह स्पष्ट परिणाम निकलता है कि यदि निष्कर्ष कि
जन - शिक्षा का कोई साधन 175 वर्नाक्यूलर स्कूलों को संगठन की समुचित दशा जन
शिक्षा का कोई साधन
है हीं नहीं में रखने और 10,730 बच्चों को ठोस प्राथमिक शिक्षा देने के लिए पर्याप्त धन नहीं है, तो देश के ‘जन - जन’ को, 14 करोड़ लोगों को, बंबई प्रेसिडेंसी के 9,00,000 बच्चों को शिक्षित करने का समूचा प्रश्न ही निरर्थक हो जाएगा। उद्देश्य ऐसा नहीं है, जिसे सरकार पूरा या लगभग पूरा कर ले। शिक्षा बोर्डों को अनसुनी उदारता की काल्पनिक अटकलों में फंसकर सीमित व्यावहारिक कर्मक्षेत्र से विचलित नहीं होना चाहिए।