ख. दलित जातियों की शिक्षा - Page 135

118 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय

प्रथम - जमींदार और जागीरदार, भूतपूर्व सामंतों के प्रतिनिधि और देशी शक्तियों के उच्च प्राधिकारी, और वे जिन्हें क्षत्री वर्ग कहा जाता है।

द्वितीय - व्यापार या वाणिज्य से धन अर्जित करने वाले अथवा वैश्य वर्ग।

तृतीय - सरकार के उच्च कर्मचारी।

चतुर्थ - ब्राह्मण, उनके साथ भले ही लम्बे अंतराल के बाद रहे हों, उच्च जातियों के उन कातिबों या मुंशियों को जोड़ा जा सकता है जो कलम का खाते हैं, यथा बंबई के प्रभु और शैनवी, बंगाल के कायस्थ बशर्तें कि शिक्षा या पद की दृष्टि से उनका रुतबा हो।

पैरा 18 - ब्राह्मण सबसे इन चार वर्गों में अतुलनीय दृष्टि से सर्वाधिक अधिक प्रभावशाली प्रभावशाली, सर्वाधिक संख्या में और कुल मिलाकर, अधिक प्रभावशाली

जो सबसे आसानी से सरकार द्वारा काम में लाया जा सकता है, वह है ब्राह्मण वर्ग। पूरे भारत में यह बात सर्वविदित है कि पुराने जागीरदार या क्षत्री वर्ग हमारे राज में बराबर पतनोन्मुख हैं। उनका पुराना व्यवसाय समाप्त हो गया है और उन्होंने नया व्यवसाय अपनाने में कोई रुचि या क्षमता नहीं दिखाई और शांति का पाठ नहीं पढ़ा। प्रेसिडेंसी में भूस्वामियों के इस अभिजात वर्ग को संबल देने के श्री एलफिंस्टोन और उनके उत्तराधिकारियों के प्रयत्न बुरी तरह विफल हुए। इस जाति के लिए नागरिक सम्मान तथा शिक्षा द्वारा उन्नति के द्वार खोलने के सभी प्रयासों पर भी पानी फिर गया। इस जाति को और कुछ भी नहीं सुहाता। वह तो झूठी शान - शौकत और फिजूलखर्ची में मस्त रहती हैं। वह तो हिन्दुस्तान के मैदानी इलाकों में अपने पूर्वजों की विजय - गाथा की यादों में खोई रहती हैं। ना ही कुछ अपवादों को छोड़कर वैश्य वर्ग में उच्च शिक्षा के प्रभाव के लिए बहुत बड़ा मार्ग खुल सका है। यों तो सभी देशों में होता है पर भारत में अधिक से अधिक सभ्य यूरोपीय देशों की अपेक्षा व्यापारियों के नौजवान जल्दी ही शिक्षा समाप्त कर देते हैं, ताकि वे अपने व्यवसाय के अनुसार या बाजार का विशेष अनुभव प्राप्त कर सकें। अंतिम वर्ग राज्य के कर्मचारियों का है। सरकार के संपर्क में आने वाले बहुत से लोगों पर उनका भारी प्रभाव होता है लेकिन उनसे भी कहीं अधिक संख्या वाले उन लोगों पर उनका कोई प्रभाव नहीं है, जो सरकारी सेवा में नहीं हैं और जनता में उनकी साख वैसी ही है, जैसी कि इंग्लैंड के सरकारी कर्मचारियों की, जिनके बारे में बड़े भद्दे ढंग से कहा जाता है कि वे तो सरकार के भाड़े के टट्टू हैं।

पैरा 19 - ब्राह्मणों की उपरोक्त विश्लेषण यद्यपि लम्बा दीख पड़ता है, परन्तु ब्राह्मणों की

विपन्नता फिर भी वह कुछ महत्वपूर्ण निष्कर्षों के लिए अपरिहार्य विपन्नता

है। पहला तो यह है कि उससे पता चलता है कि शिक्षा प्रचार के लिए जिस वर्ग का उपयोग प्रभावशाली वर्ग के रूप में सरकार कर सकती है, वह है ब्राह्मण और लगभग