ख. दलित जातियों की शिक्षा - Page 140

दलित वर्ग की शिक्षा

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किया जाए, परन्तु अभी भी ऐसे सुधार के लिए विरोधी लोग मौजूद थे, जिन्हें उस पत्र में वर्णित सिद्धान्त को लेकर भारी आशंकाएं थीं और जो उस नीति को रद्द करने के लिए आंदोलन कर रहे थे। पिछड़ी जातियों के जीवन स्तर को उठाने के कारण शासन को भयंकर परिणामों का सामना करना पड़ सकता है। यह बात बोर्ड ऑफ कंट्रोल के प्रेसिडेंट लार्ड एलेनब्रो जैसे लोगों को अभी भी सता रही थी। लार्ड एलेनब्रो कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स के अध्यक्ष को 28 अप्रैल 1858 के अपने पत्र में निम्नलिखित चेतावनी देने से नहीं हिचकिचाएः

सज्जनों, हाल ही में मुझे ऐसे अनेक पत्र मिले हैं, जिनमें 1854 में कोर्ट आफ डायरेक्टर्स

द्वारा दिए गए अनुदेशों के अंतर्गत भारत के विभिन्न भागों में शिक्षा की स्थिति की

समीक्षा की गई है और मैं स्वीकार करता हूँ कि मुझे उनसे कोई ऐसा आभास नहीं

हुआ कि उस समय स्थापित प्रणाली से अपेक्षित लाभ हुआ है। जब कि लगता है

कि लागत में जिस वृद्धि की अपेक्षा की गई थी, वह हो रही है।

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पैरा 11. मैं समझता हूं कि हम छोटी जातियों के लोगों को अपने बच्चों को स्कूल भेजने के लिए बहुत कम प्रेरित कर पाते हैं और यदि हम शिक्षा का अपने मनोनुकूल विस्तार करने में सफल होते हैं, तो हमें श्रमिक वर्ग का अधिक बौद्धिक विकास करना होगा, भले ही इसमें अधिक धनाढ्य व्यक्तियों की उपेक्षा हो जाए।

पैरा 12. इसके परिणामस्वरूप किसी स्वस्थ समाज की स्थापना नहीं होगी। हमारी सरकार छोटी जाति के सर्वाधिक शिक्षित व्यक्ति की उस महत्वाकांक्षा को पूरा कराने के साधन भी उपलब्ध नहीं करा सकी, जो हमने उनके मन में जगाई थी।

पैरा 13. हमें निर्धन व्यक्तियों का एक ऐसा असंतुष्ट समाज बनाना चाहिए, जिसका हमारे द्वारा दी गई उच्च शिक्षा के कारण जनसाधारण पर भारी प्रभाव हो।

पैरा 14. छोटी जातियों को शिक्षा और सभ्यता ऊंची जातियों से मिलनी चाहिए और इस प्रकार छोटी जातियों में एक नई शक्ति का संचार होना चाहिए, किन्तु शिक्षा और सम्यता कभी भी नीचे से ऊपर की ओर नहीं जाती। यदि शिक्षा और सम्यता केवल छोटी जातियों को उपलब्ध कराई जाए, तो इससे केवल विक्षोभ पैदा होगा, जिसके पहले शिकार विदेशी होंगे।

पैरा 15. यदि हम शिक्षा का प्रसार करना चाहते हैं, तो हमें सबसे पहले ऊंची जातियों के लोगों को शिक्षित करने का प्रयास करना चाहिए।

पैरा 16. इसके केवल दो रास्ते हैं, कालिजों की स्थापना की जाए, जिनमें केवल ऊंची जातियों को प्रवेश दिया जाए और सेना के पुनर्गठन में स्थानीय लोगों के उन्हीं बच्चों को कमीशन दिया जाए, जो इसे पाने के पात्र हैं।