ख. दलित जातियों की शिक्षा - Page 141

124 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय

  1. अस्पृश्य जातियों के प्रति यूरोपीय अधिकारियों की इस चिढ़ को अंततः भारत मंत्री ने 1859 के अपने पत्र में दूर किया, जिसमें जन-शिक्षा के लिए सरकार के दायित्व की बात दोहराई गई थी।

  2. जैसा कि स्पष्ट है कि सरकार द्वारा जन शिक्षा के अपने दायित्व को स्वीकार करने से दलित जातियों को एक ऐसा लाभ मिला, जो केवल नाममात्र का था, क्योंकि विभिन्न जिलों में स्कूल तो सर्वसाधारण के लिए खुले थे, परन्तु इनमें दलित जातियों के दाखिले का प्रश्न अभी हल होना था। ऐसा एक प्रश्न 1856 में भी उठा था, परन्तु सरकार का फैसला दलितों के पक्ष में नहीं था, जैसा कि बंबई प्रेसिडेंसी के जन-शिक्षा निदेशक की 1856 - 57 की रिपोर्ट के निम्नलिखित उद्धरण से स्पष्ट है :

पैरा 17. छोटी जातियों और बनवासी जन जातियों के लिए स्कूल सरकार की ओर से सीधे छोटी जातियों के लिए कोई स्कूल नहीं खोले गए हैं और सर्वोच्च सरकार ने ऐसे स्कूलों के लिए अनुमति नहीं दी है। कहने के लिए सरकार द्वारा पूर्णतः समर्थित आम स्कूल तो सभी जातियों के लिए खुलें हैं। 1855 - 56 की मेरी रिपोर्ट के परिप्रेक्ष्य में सरकार ने निम्नलिखित आदेश दिया : ‘‘अभी तक सरकार के सामने केवल एक ही मामला लाया गया हैं, जिसमें सरकारी स्कूलों में छोटी जातियों के छात्रों के प्रवेश का प्रश्न उठाया गया है। यह मामला एक महार छात्र का है, जिसकी ओर से जून 1856 में एक याचिका पेश की गई, जिसमें शिकायत की गई थी कि यद्यपि वह स्कूल की फीस देने के लिए तैयार था तथा उसे धारवाड़ गवर्नमेंट स्कूल में दाखिला नहीं दिया गया।’’

इस अवसर पर सरकार को एक अति व्यावहारिक संकट का सामना करना पड़ा, जिसका संबंध एक प्रश्न पर विचार करने से था। प्रश्न यह था कि उनके अमूर्त अधिकार की धारणा उन स्थानीय लोगों की सामान्य भावनाओं के प्रतिकूल होती जिनकी यथासंभव जागृति के लिए सरकार के शिक्षा विभाग की स्थापना की गई है और जैसा कि कुछ संकोच के साथ उस समय पारित संकल्प [*] में दीख पड़ेगा। यह फैसला किया गया कि एक अकेले व्यक्ति यानी केवल उस महार के पक्ष में जो पहली बार केवल सवर्ण जातियों के छात्रों वाले स्कूल में प्रवेश की याचना लेकर आगे आया था, यह ठीक नहीं रहेगा कि उसे सवर्णों के साथ जबरदस्ती बिठाया जाए और यह संभावित जोखिम उठाया जाए कि स्थानीय लोगों के लिए वह संस्था व्यर्थ-सी ही हो जाए।

* 21 जुलाई, 1856 का सरकार द्वारा पारित किए गए संकल्प का मूल पाठ :

  1. पत्राचार में चर्चित प्रश्न अति व्यावहारिक कठिनाई वाला है।

  2. इस बारे में कोई संदेह नहीं हो सकता कि महार याचिकादाता के पक्ष में अमूर्त न्याय है और सरकार का विश्वास है कि धारवाड़ में शिक्षा के वर्तमान साधनों का उपयोग करने से फिलहाल जो पूर्वाग्रह उसे रोक रहे हैं, वे संभवतः काफी पहले दूर कर दिए गए हों।

  3. लेकिन सरकार को यह ध्यान में रखना ही होगा कि यदि किसी एक या चंदव् यक्तियों के लिए सरसरी तौर पर युगों पुराने पूर्वाग्रहों के साथ छेड़छाड़ की जाएगी, तो उससे संभवतः शिक्षा के ध्येय को भारी क्षति पहुंचेगी। याचिकादाता को जिस असुविधा का सामना करना पड़ रहा है, वह ऐसी नहीं है, जिसकी शुरुआत इस सरकार ने की है और जिसे सरकार उसके पक्ष में तुरंत हस्तक्षेप करके दूर कर दे, जैसी कि याचना उसने की है।