ख. दलित जातियों की शिक्षा - Page 142

दलित वर्ग की शिक्षा

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इस संबंध में बंबई सरकार की कार्यवाही पर भारत सरकार ने दिनांक 23 जनवरी 1857 के पत्र संख्या 111 में निम्नलिखित विचार प्रकट किए :

‘‘गर्वनर जनरल इन काउंसिल का विचार है कि संभवतः बंबई सरकार ने इस बारे में बुद्धिमत्तापूर्ण कदम उठाया है, लेकिन उसमें मुझसे अर्थात (भारत मंत्री से) अपेक्षा की गई है कि मैं कहूं कि बालक को बंगाल की प्रेसिडेंसी के किसी सरकारी स्कूल में दाखिला दिए जाने से इंकार नहीं किया जाएगा।’’ [*]

इस पत्र के प्राप्त होने के बाद यह संकल्प किया गया कि भारत सरकार को यह आश्वासन दिया जाए कि यह सरकार ऐसे किसी साधन की यथाशक्ति उपेक्षा नहीं करेगी, जिसके द्वारा देश भर के स्कूलों का स्वरूप उतना विशिष्ट न हो जितना कि जाति के मामले में वे व्यवहार रूप में है, लेकिन शर्त यह है कि ऐसा करते समय सरकारी स्कूल की सामान्य प्रतिष्ठा पर आंच न आए ओर उनकी दक्षता बनी रहे और वह उद्देश्य सफल हो, जिसके लिए उनकी स्थापना की गई है। यह भी निश्चय किया गया कि इस बारे में जांच की जाए कि उस सिद्धांत का व्यवहार पक्ष क्या है? जिसके बारे में कहा जाता है कि वह प्रचलित है और सरकारी स्कूलों की सामान्य उपयोगिता पर कुप्रभाव डाल रहा है।

  1. बंगाल में प्रचलित प्रणाली के बारे में की गई जांच से पता चला कि भारत सरकार की मान्यता के विपरीत बंगाल के अधिकारियों ने यह भार शिक्षा संबंधी जिला समितियों पर छोड़ दिया कि वे हर मामले में स्थानीय लोगों की भावनाओं को देखते हुए छोटी जातियों के छात्रों को प्रवेश दें या न दें। इसका नतीजा यह निकला कि दलित जातियां उपेक्षित रह गईं, क्योंकि स्पृश्य जातियां उन्हें विद्या मंदिरों में घुसने नहीं देंगी, जिनकी स्थापना सरकार ने अपने समस्त प्रजाजनों के लिए की थी।

  2. इन परिस्थितियों में 1854 के डिस्पैच में उल्लिखित जन शिक्षा व्यवहार रूप में दलित जातियों को छोड़कर शेष सभी को उपलब्ध थी। 1854 में दलित जातियों की शिक्षा पर से भी प्रतिबंध उठाया गया। वह केवल नाममात्र का प्रयास था। भले ही बहिष्कार न करने के सिद्धांत की पुष्टि सरकार ने कर दी थी पर व्यवहार में बड़ी सफाई से उसकी अनदेखी की गई। अतः हम यह कह सकते हैं कि प्रतिबंध व्यवहार में पहले की तरह बना रहा।

दलितों को शिक्षित करने का जिम्मा जो संस्था ले सकती थी, वह केवल ईसाई मिशनरी थी। माउंट स्टुअर्ट एलफिंस्टन के शब्दों में उन्हें ‘दलित जातियां सर्वोत्तम

* दिनांक 28 अप्रैल, 1858 के डिस्पैच में (संख्या 58) कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स ने इस विषय पर निम्नलिखित आदेश दियाः

‘‘सरकारी शिक्षा संस्थाएं हमने इसलिए खोली हैं कि उनमें सभी जातियों के बच्चे पढ़ सकें और हम उस सिद्धांत से

विचलित नहीं हो सकते जो मूलतः स्वीकार्य है और जिसे सर्वाधिक प्रमुखता दी जानी चाहिए। यह संभव है कि कुछ

मामलों में इस सिद्धांत को लागू करने से कुछ छात्र स्कूल जाना छोड़ दें। लेकिन यह कहना पर्याप्त है कि जो व्यक्ति

उसके व्यावहारिक प्रवर्तन पर आपत्ति करते हैं, उन्हें यह छूट होगी कि वे धन देना बन्द कर दें और एक अलग आधार

पर स्कूल खोलने के लिए अपने धन का उपयोग कर सकें।’’