ख. दलित जातियों की शिक्षा - Page 143

126 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय

जातियां लगीं।’ किन्तु सरकार धार्मिक तटस्थता पर कृत - संकल्प थी और मिशनरी स्कूलों को सहायता नहीं दे सकती थी। यहां तक कि इस अवधि के प्रारंभ में इस प्रेसिडेंसी ने कोई आर्थिक अनुदान नहीं दिया था, यद्यपि 1854 के शिक्षा संबंधी डिस्पैच में मिशनरी स्कूलों को अनुदान देने पर कोई प्रतिबंध नहीं लगाया गया था।

  1. इस गतिरोध को समाप्त करने के लिए सरकार ने दो उपाय किए : (1) छोटी जातियों के बच्चों के लिए अलग सरकारी स्कूलों की स्थापना की गई, और (2) अनुदान सहायता के नियमों में ढील देकर मिशनरी संस्थाओं को शिक्षा कार्य में विशेष प्रोत्साहन दिया गया। यदि ये दो उपाय न किए गए होते, तो दलित जातियों को शिक्षित करने के कोई परिणाम नहीं निकलते। 1882 में हंटर आयोग की समीक्षानुसार ये परिणाम अति अल्प थे।
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  1. 1882 के बाद 1923 में बंबई प्रेसिडेंसी की शिक्षा के इतिहास में नये विशेष अध्याय का सूत्रपात हुआ। उस साल प्राथमिक शिक्षा प्रांतीय सरकार के स्थान पर स्थानीय निकायों को सौंप दी गई। इसलिए यह युक्तिसंगत होगा कि 1923 की स्थिति का जाएजा लिया जाए। बंबई प्रेसिडेंसी में 1923 में शिक्षा प्रसार के क्षेत्र में विभिन्न वर्गों की स्थिति निम्नांकित सारणी में दर्शाई गई है :

प्रेसिडेंसी में लोगों जनसंख्या - शिक्षानुसार क्रम

की श्रेणियां [*] नुसार

क्रम प्राथमिक माध्यमिक कालिज वाली

उन्नत हिन्दू चतुर्थ प्रथम प्रथम प्रथम

मध्य क्रम के हिन्दू प्रथम तृतीय तृतीय तृतीय

पिछड़े हिन्दू द्वितीय चतुर्थ चतुर्थ चतुर्थ

मुस्लिम तृतीय द्वितीय द्वितीय द्वितीय

  1. इस सारणी से हमें पता चलता है कि शिक्षा की दृष्टि से इन विभिन्न जातियों की तुलनात्मक उन्नति में भारी विषमता है। जनसंख्या की दृष्टि से इन लोगों की जो श्रेणी है और शिक्षा को प्राप्त करने की दृष्टि से उनकी जो श्रेणी है, उसके अनुसार यदि इनकी तुलना की जाए तो हम देखते हैं कि मध्य क्रम जो आबादी की दृष्टि से प्रथम श्रेणी का है, वह कालेज की शिक्षा की दृष्टि से तृतीय श्रेणी का है, माध्यमिक शिक्षा की दृष्टि से तृतीय श्रेणी का है और प्राथमिक शिक्षा की दृष्टि से तृतीय श्रेणी का है। दलित वर्ग

* बंबई सरकार के शिक्षा विभाग ने इस प्रेसिडेंसी के लोगों को विभागीय प्रयोजनों के लिए चार अलग . अलग श्रेणियों

में रखा है। एक में ब्राह्मण और संबंधित जातियां है, जिन्हें संयुक्त रूप से उन्नत हिन्दू कहा जाता है। मराठों और

संबंधित जातियों को मध्य क्रम के हिन्दू नामक अलग श्रेणी में रखा गया है। बाकी लोग जिनमें दलित जातियां, पर्वतीय

आदिमजातियां और जरायम पेशा जातियां शामिल हैं उनकी एक अलग श्रेणी है जिसे पिछड़ा वर्ग कहते हैं। इन तीन

श्रेणियों में एक चौथी श्रेणी जोड़ी गई है, जिसमें प्रेसिडेंसी और सिंध के मुसलमान शामिल हैं।